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Showing posts from 2021

एक क्रांतिकारी ऐसा भी ( भगवती चरण वोहरा और दुर्गा भाभी )

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त उस समय गिरफ्तार हो चुके थे और लाहौर जेल में थे ।  बाहर जो क्रांतिकारी थे, वो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयासरत थे । उन्हीं में से एक थे भगवती चरण वोहरा जिन्हें 'बापू भाई' या 'बाबू भाई' भी कहा जाता था। कुछ क्रांतिकारी उन्हें भगत सिंह के परामर्शदाता भी कहते हुए दिखते हैं। वो दुर्गा भाभी के पति थे। इन दोनों का आजादी के संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान रहा है।  उन लोगों ने निर्णय किया कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को हम ससस्त्र छुड़ा लेंगे । बमों और पिस्तौलों से लैस होकर पुलिस दल पर हमला करेंगे और भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त को छुड़ा लेंगे । जिसके लिए बम बनाए गए। अभी बम का परीक्षण होना बाकी था की बम कितना अधिक घातक सिद्ध होगा इसको जांचने के लिए  यह घटना लाहौर के रावी नदी के किनारे की है। इसके लिए भगवती चरण वोरा , सुखदेवराज और विश्वनाथ वैशम्पायन को चुना गया। उस वक्त आजाद वहां मौजूद नहीं थे। ये तीनों लोग  28 मई 1930 के सुबह 10 / 11 बजे के करीब बम लेकर निकलते हैं रावी नदी की ओर जहाँ बिना ज्यादा मशक्क्त के उन्हें नाव भी मिल जाती है क्यूंकि सुखदेव रा...

कविताएँ

 बस तुम बेईमान हो  तुम्हें उन लोगों से ख़ब्त की बू आती है जो बात करते हैं आजादी की शिक्षा की रोजगार की तुमने कभी सोचा है कितनों ने इसी आजादी, समता, समानता की बात करने के लिए जवानी गला दी अपनी लोहे के जेबरों को अपने पहुँचे और पसलियों पे ढोते हुए लोहे के सलाखों के पीछे पिघलते हुए क्या तुम्हें पता है कितनों ने अपना बूंद बूंद रक्त बहा दिया तुम्हारी बाँझ होती नस्ल को सींचने के लिए तुम्हें तो सब पता है … बस तुम बेईमान हो बस तुम बेईमानों को याद रखना चाहते हो देवता बना कर पूजना चाहते हो तुम देवता हुए लोगों को उनका इतिहास रचने में मदद कर रहे हो ये भूल कर कि देवताओं के इतिहास में सिर्फ देवताओं का ही समुदाय होता है पूजकों का कोई जिक्र नहीं होता कभी नहीं ! कभी भी नहीं ~ सिद्धार्थ मेरा भगवान … राम मेरा भगवान … राम प्यास मैं तो … भागीरथी राम भूख मैं तो … रोटी राम नंगा मैं तो … लंगोटी राम बेघर मैं तो … घर राम शाखा मैं तो … जड़ राम मैं कुछ भी नहीं … सब कुछ राम अब कई दिनों से मैं भूखा हूं पानी की आस में सूखा हूं राम राम जपता हूं राम राम लिखता हुं फिर भी मैं भूखा हूं पेट की आग में कंठ तक झुलसा ह...

आज लिख देती हूॅॅं

शंख सख्त खोल के अंदर तुम भी उतने ही कोमल हो  जितना कि कोई फूल बस तुम्हें खुद को छुपाए रखना पड़ता है  दुनिया के आघातों से इसी क्रम में, तुम चूक जाते हो प्रेम से मगर कब तक छुपा पाओगे खुद को  अपनी कठोरता के नीचे किसी रोज कोई प्रेम में आसक्त होंठ  तुम्हारी कठोरता को चूम लेगा  और तुम बज उठोगे किसी के प्रेम का आलाप बनकर या फिर किसी क्रांति का उद्घोष बन कर  या कोई अपनी पूरी आस्था से  तुममें जल भरेगा और  छींट देगा पूरी मानवता पर कि जल जाए उनकी सारी अशुद्धि दो शुद्ध होठों के स्पर्श को  तुम रोक नहीं पाओगे शंख बनकर  ~ सिद्धार्थ 20-03-21 2) प्रतीक्षा शेष है मैं खर्च हो रही हूॅं मंदी में गुल्लक से निकले  रेजगारी की तरह तुम दूर जा रहे हो जेठ वैशाख के जलते चौपाल में  धरती के नाभि की ओर  खिसकते पानी की तरह बस प्रतीक्षा शेष है मंदी के जाने का  और सावन के आने का और मेरे अंदर तुम अहर्निश अशेष ~ सिद्धार्थ 3) प्राण तुम्हारी याद घर के सारे खिड़की दरवाजे  बंद करने के बावजूद  न जाने कहां से आ जाती है धूल और कोने कोने में  स्था...

क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास (चापेकर बंधुओं से भगत सिंह तक)

 स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों के प्रवेश की घोषणा करने वाला पहला धमाका 1897 में पुणा में चाफेकर बंधुओं ने किया था।  पूना शहर में उन दिनों प्लेग जोरों पर था। रैंड नाम के एक अंग्रेज को वहां प्लेग कमिश्नर बना कर भेजा गया। वह बड़ा ही जालिम और तानाशाह किस्म का आदमी था। उसने प्लेग से प्रभावित मकानों को बिना कोई अपवाद खाली कराए जाने का हुक्म जारी कर दिया। जहां तक उस हुक्म का सवाल है उसमें कोई गलत बात नहीं थी। लेकिन जिस तरह रैंड ने इस पर अमल करवाया उससे वह अलोकप्रिय हो गया। लोगों को उनके घरों से निकाला गया है और उन्हें कपड़े बर्तन आदि तक ले जाने का समय नहीं दिया गया। 4 मार्च 1897 को लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र केसरी में एक लेख लिखकर ना सिर्फ नीचे के अफसरों पर बिल्कुल बल्कि खुद सरकार पर एक इल्जाम लगाया कि वह जानबूझकर जनता को उत्पीड़ित कर रही है । उन्होंने रेंट को निरंकुश बतलाया और सरकार पर दमन का सहारा लेने का आरोप लगाया। फिर आया शिवाजी समारोह इस अवसर पर 12 जून 1897 को एक सार्वजनिक सभा में अध्यक्ष पद से बोलते हुए तिलक ने कहा : 'क्या शिवाजी ने अफजल खान को मारकर कोई पाप किया था ? इ...

बाइस्कोप

 मेरे बचपन में जहां अन्य बच्चों को टीवी देखना, मेला घूमना, खेलना-कूदना पसंद था । वहीं मुझे  बाइस्को देखना पसंद था।  हफ्ते में शायद एक या 2 दिन ठीक से कुछ याद नहीं, पर ठीक दूपहरी में वो कंधे पर टीन का एक बक्सा लटकाए डमरु डूगडुगाते  हुए गांव के एक सरहद से प्रवेश कर गली गली में घूमते हुए दूसरी सरहद से निकल जाता था। जहां से भी वो गुजरता कुछ बच्चे एकजुट होकर देखने लग जाते और कुछ पैसे उसके हाथों पर रख अपने अपने घर चले जाते।  लेकिन मेरा कुछ अलग ही मामला था। मैं हर रोज दिन चढ़ने के साथ ही उसका इंतजार करने लगती। उस समय अधिकतर घरों में दीवार घड़ी नहीं हुआ करती थी। सो हमारे घर में भी नहीं ही थी और हाथ की घड़ी को देखना मुझे तो आता ही नहीं था। बड़े होने पर, बहुत मशक्कत से सीख पाई थी। लेकिन बालमन में बैठा हुआ डमरू का डूग डूग और बाइस्कोप का सपनों का संसार समय को समझने की कला में मुझे निपुण कर दिया था।  या ये कहना ज्यादा यथोचित होगा कि सभी बच्चे अपने किसी प्रिय खेल के समय को समझने में यूं ही निपुण हो जाते हैं । इसे मैं अब भी नहीं समझी जिसका भी अपना अलग ही कारण है। खैर ... ...

शब्द

 शब्द को पढ़ो शब्द को पढ़ते-पढ़ते  शब्द को सुनो शब्द में शब्द मत ढूंढो शब्द में खो जाओ तब तुम समझ पाओगे शब्द वो भी बोलना जानतें हैं जिसे तुम सुनने को तैयार नही जब शब्द तुम्हारी नाभि तक उतर आये और भूचाल मचा दे रक्त में   तब पूछना उससे ! उसका मर्म वो सुसुप्ता अवस्था में भी विस्फोटक होता है... क्यूँ कि शब्द में सब निहित होता है ... 1-9-2019 ~ सिद्धार्थ

घृणा और देवता का जन्म बहुत बाद में हुआ था

जब लोग सीख रहे थे  धर्म की बोआई करना  ताल पत्रों के सीने पर उस से बहुत पहले ...   सृष्टि के पहले पुरुष और पहली स्त्री जान गये थे पेट के भूख को और सीख गया था पुरुष  स्त्री से प्रेम करना  और  स्त्री के माटी में प्रेम बोना स्त्री ने पुरुष के प्रेम को जन्म दिया स्त्री ने और स्त्रियों और पुरुषों को जन्म दीया बिल्कुल सभ्यता के सूरुआत में ही दोनों सीख गए थे  अपना और अपने प्रेम से जन्में संतानों  के भूख को मिटाना और रक्षा करना अपनी संत्तियो का उनके कंठ से तब नहीं गिरा था कोई बीज मंत्र नहीं जुड़े थे हाॅंथ किसी देवता के सामने उनका हाॅंथ बढ़ा था औजार बनाने के लिए उनका हाॅंथ बढ़ा था शिकार करने के लिए पत्थरों के सीने से आग निकालने और आग को सहेजने के लिए भूख से लडने के लिए  तब देवता नहीं जन्में थे जब भूख ने सीखा दिया था मनुष्य को धरती का सीना फाड़ कर बीज बोना और अन्न उपजाना जब देवता अस्तित्व में नहीं आए थे उस से बहुत पहले स्त्री और पुरुष किसान हो गए थे  सीख गए थे भूख से लड़ना  और एक दूसरे से प्रेम करना  घृणा और देवता का जन्म  बहुत ...

मैं " सिद्धार्थ" बुद्ध नहीं इंसान होना चाहती हूॅं

 मैं " सिद्धार्थ" बुद्ध नहीं इंसान होना चाहती हूॅं मेरे नाम में बुद्घ निहित है " सिद्धार्थ" पर मैं बुद्ध नहीं, बुद्ध होना भी चाहूं तो... हो  नहीं  सकती,  क्यूं कि...मैं स्त्री हुॅं,  स्त्री जिस के लिए खींचे गए है अनदेखे लक्ष्मण रेखा,  जिस में जन्म से बोया गया है  यशोधरा और सीता के "जी" को कहां संभव है किसी स्त्री का बुद्ध हो पाना  अंधेरे का हाथ पकड़,  गेरुआ धारण कर पाना और निकल जाना  स्त्य के उजाले की तलाश में और पलट कर भी न देखना  गृहस्थी के आकाश को मैं बुद्ध तो नहीं,  मैं पुरुष तो नहीं, मैं स्त्री हूॅं कहां संभव है मुझ स्त्री के लिए जो धारण तो करती है नाम  बुद्ध के कई नामों में से एक नाम "सिद्धार्थ" को  सत्य ढूंढती फिरुं बुद्ध होने के तलाश में  जंगलों में बिना किसी अवकाश के मन में लिए सत्य के विश्वास को मेरे ही सत्य को कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा मेरे ही सत्य से मेरे स्त्रीत्व का गला घोट दिया जाएगा मुझे बुद्ध तो नहीं! पर  कुलटा, चरित्रहीना साबित कर दिया जायेगा बुद्ध होने के लिए,  उस से पहले इंसान होन...

मुझे याद है

 मुझे याद है  मैंने कहा था सांप!  उसने सुना था आप मैंने फिर कहा! इन्हें नाप उसने कहा! अरे ना हाथ जोड़कर करो जाप मैंने झल्लाकर फिर कहा  ये हैं श्राप उसने फिर कहा अरे नहीं अरे ये तो हैं हमारे बाप  मैंने कहा देखो तो चहुंओर   अविश्वास की हवा चली  भूख की है आग लगी  रोजगार की खेत जली  उसने कहा देखो तो   धर्म की कैसी जोत जली  देशभक्ति की शीतल बयार चली    तभी! 6 वर्ष की बेटी ने  धोती खींचते हुए उन्हें ये कही  'बाबा क्यूं फिर 4 दिन से   अपने घर के चूल्हे पे   नहीं कोई पतीली चढ़ी  अंदर चल कर देखो तो  मां धरन से क्यूं झूल रही  नाक का लैंग पायल - बिछिया  सब बिस्तर पर क्यों छोड़ चली' मुझे याद है मैंने कहा था संसद से उठती हवा हमें  मानसिक दासता के सडन की ओर ले चली ~ सिद्धार्थ  2;  हे ईश्वर मैंने देखा  लोगों की तनी हुई थी भौंएं सना हुआ था हाॅंथ खून से बिखरी हुई थी लाशें चारों तरफ  लाशों के पेट फाडे गए थे  तलाशी ली गई थी कुछ मुट्ठी चावलों की  जो...