कविताएँ

 बस तुम बेईमान हो 

तुम्हें उन लोगों से ख़ब्त की बू आती है

जो बात करते हैं आजादी की

शिक्षा की
रोजगार की
तुमने कभी सोचा है
कितनों ने इसी आजादी,
समता, समानता की बात करने के लिए
जवानी गला दी अपनी
लोहे के जेबरों को
अपने पहुँचे और पसलियों पे ढोते हुए
लोहे के सलाखों के पीछे पिघलते हुए
क्या तुम्हें पता है
कितनों ने अपना बूंद बूंद रक्त बहा दिया
तुम्हारी बाँझ होती नस्ल को सींचने के लिए
तुम्हें तो सब पता है …
बस तुम बेईमान हो
बस तुम बेईमानों को याद रखना चाहते हो
देवता बना कर पूजना चाहते हो
तुम देवता हुए लोगों को
उनका इतिहास रचने में मदद कर रहे हो
ये भूल कर कि देवताओं के इतिहास में
सिर्फ देवताओं का ही समुदाय होता है
पूजकों का कोई जिक्र नहीं होता
कभी नहीं ! कभी भी नहीं
~ सिद्धार्थ

मेरा भगवान … राम

मेरा भगवान … राम
प्यास मैं तो … भागीरथी राम
भूख मैं तो … रोटी राम
नंगा मैं तो … लंगोटी राम
बेघर मैं तो … घर राम
शाखा मैं तो … जड़ राम
मैं कुछ भी नहीं … सब कुछ राम
अब कई दिनों से मैं भूखा हूं
पानी की आस में सूखा हूं
राम राम जपता हूं
राम राम लिखता हुं
फिर भी मैं भूखा हूं
पेट की आग में कंठ तक झुलसा हूं
क्या राम हैं झूठे
या फिर भूख मेरा है झूठा
क्या मेरा राम नाम से विश्वास है टूटा
या सदियों की गलियों में
आदम को आदम ने है राम नाम पे लुटा
~ सिद्धार्थ

अंधेरा …
अंधेरा ही तो था
जब नन्ही हथेलियों से
दरवाजे को धकेला था उसने
माॅं के सीने से लग कर सोने के लिए
चुभ गई थी कुछ रक्त लगी कांच की चूड़ियों के टुकड़े
एक लोटा लुढ़कता हुआ आया था
जिस नन्हें पांव के नीचे
चिंख अंदर ही घुट कर रह गई थी
ठोढ़ी ! जरा और नीचे झुक गई थी
अंधेरे में जाने कब तक
रिस्ते रक्त और दर्द में बैठी रही थी वो
माटी के नरम दीवाल से लग कर
सुबह खुद को बिस्तर पे देखा
माॅं को आँखें लाल और पीठ पे
काले निशान लिए
घर के काम को करते देखा
उस अंधेरे ने पीछा ही नहीं छोड़ा
हमेशा लिपटा रहा उसकी चोटी से

उस दिन भी तो अंधेरा ही था
जब लालटेन का शीशा चटक गया था
उसकी पेंसिल के चोट से
ढूंढ़ रही थी किसी सधे हुए हाॅंथ को
किसी के गिर जाने से डर गई थी वो
अपनी ही भूल समझ खुद को
बीसियों बार कोसा था उसने
और पेंसिल को दी थी गाली
करमजली पेंसिल के कारण ही
अंधेरा नज़र के इर्द गिर्द है पसरा हुआ
जाने कौन अंधेरे में थोड़ा और लंगड़ा हुआ

तभी एक फटी हुई फ्राक गिरी थी उस पर
जिसके गंध को भली प्रकार पहचानती थी वो
उम्र में बड़ी … पर उसकी तो सखी थी वो
उसी के घर में काम करने निश दिन आती थी वो
उसकी सिसकियों को थामे जब चली थी वो
बेसुध ! कमरे के जमीन पड़ परी मिली थी वो
उस रात की भी सुबह तो हुई
पर अंधेरा और पसर गया
नन्हीं हथेलियों और हलक के बीच
साथ छूट गया था सखी का
तीनों जानते रहे ताउम्र उस अंधेरे को
और छिपते रहे एक दूसरे से

ऐसे ही न जाने कितनी और अंधेरी रात
अपने कजरिया टांक गयी
उसके बाल मन दिमाग में

जवानी के अपने ही अंधेरे मिले
हर उम्र में उसे अंधेरे ही अंधेरे मिले
अब वो अँधेरे रे से भाग कर
अँधेरे में ही छुपती है
हर वक़्त उजाले को पुकारती है
अंधेरा पीछा नहीं छोड़ता
उजाला उस से भागता है
~ सिद्धार्थ

***

लहू को इतना भी तमीज नहीं 

कि बदन लोहा खाए 

और लहू दहलीज न लाँघे 

बदन के हर लोच में है लहू शामिल 

लहू की बतमीजी 

बदन को माटी बनाये 

सत्ता की मार है भाई ! ये 

जीते इंसानो को लाश बनाये 

~ सिद्धार्थ 

***

प्रार्थनाओं से गर खाली थालियां रोटियों से भर जाती
भूखों के अतृप्त आत्मा को छप्पन भोग से तर कर जाती
तो मैं दिन रात प्रार्थना ही करते - करते मर जाती
प्रार्थनाओं से अगर टूटी हुई छत शबनम नहीं बरसाती
दीवारों के बाहों में सीलन गर सेंध नहीं लगा पाती
तो मैं दिन रात प्रार्थना करते करते ही मर जाती
प्रार्थनाओं से गर खेत बिना जोते - कोड़े बिना बीज को बोए
फसल से लहलहा जाती, कटाई निदाई हो जाती
किसानों की झोली अन्न से भर जाती खुश उनको कर जाती
तो मैं दिन रात प्रार्थना करते करते ही मर जाती
प्रार्थनाओं से गर खेलते कूदते बच्चे विद्या धन अर्जित कर लेते
पेड़ों से टॉफी बिस्किट और पैसे तोड़ लेते
थोड़ा धन भविष्य के लिए अर्जित फिर संचित कर लेते
तो मैं दिन रात प्रार्थना करते करते ही मर जाती
मगर सच अलग है, सच कठोर है, सच पे प्रार्थना का कोई जोर नहीं है
इन सभी को पाने के लिए, देह - दिमाग लगाना ही पड़ता है
खुद को श्रम के भट्ठी में गलाना ही पड़ता
है...
तो मैं किस तरह प्रार्थना करूं? क्यूं न खुद को श्रमिक करूं???
~ सिद्धार्थ
***




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