आज लिख देती हूॅॅं

शंख

सख्त खोल के अंदर
तुम भी उतने ही कोमल हो 
जितना कि कोई फूल
बस तुम्हें खुद को छुपाए रखना पड़ता है 
दुनिया के आघातों से
इसी क्रम में, तुम चूक जाते हो प्रेम से
मगर कब तक छुपा पाओगे खुद को 
अपनी कठोरता के नीचे
किसी रोज कोई प्रेम में आसक्त होंठ 
तुम्हारी कठोरता को चूम लेगा 
और तुम बज उठोगे
किसी के प्रेम का आलाप बनकर
या फिर किसी क्रांति का उद्घोष बन कर 
या कोई अपनी पूरी आस्था से 
तुममें जल भरेगा और 
छींट देगा पूरी मानवता पर
कि जल जाए उनकी सारी अशुद्धि
दो शुद्ध होठों के स्पर्श को 
तुम रोक नहीं पाओगे शंख बनकर 

~ सिद्धार्थ
20-03-21
2)

प्रतीक्षा शेष है

मैं खर्च हो रही हूॅं
मंदी में गुल्लक से निकले 
रेजगारी की तरह

तुम दूर जा रहे हो
जेठ वैशाख के जलते चौपाल में 
धरती के नाभि की ओर 
खिसकते पानी की तरह

बस प्रतीक्षा शेष है
मंदी के जाने का 
और सावन के आने का
और मेरे अंदर तुम अहर्निश अशेष
~ सिद्धार्थ
3)

प्राण तुम्हारी याद

घर के सारे खिड़की दरवाजे 
बंद करने के बावजूद 
न जाने कहां से आ जाती है धूल
और कोने कोने में 
स्थापित कर जाती है अपना वजूद
'प्राण' कुछ इसी तरह की है 
तुम्हारी याद 

मेरे बंद खिड़की के उस पार 
जैसे रोज आ जाती है 
एक ढीठ चिड़ईया 
पुराना सब कुछ भूल
जिसे पेट भर खाना खिला 
मैं रोज मुस्कुराते हुए विदा कर देती हूॅं
पुनः पुनः लौट आती है वो 
जैसे चुकाना है मुझे पुराना कोई सूद
'प्राण' कुछ इसी तरह की है तुम्हारी याद
~ सिद्धार्थ
01-03-21

4) मैं न पहले कभी मरी थी न आगे कभी मरूंगी

लोग कहते हैं लोग मर जाते हैं
मैं कहती हूॅं
मैं न पहले कभी मरी थी
न आगे कभी मरूंगी
युगो युगो से युग परिवर्तन के सोच
को लिए हर मनुष्य में मैं ही तो थी
प्रेम में झूमते लोगों में भी मैं
नैराश्य को चूमते लोगों में भी मैं
मैं ही मैं पहले भी थी
आगे भी रहूंगी
आजादी की बात करते
हर पागल रूह में
मिल जाऊंगी अनायास ही मैं
मैं न पहले कभी मरी थी
न आगे कभी मरूंगी
~ सिद्धार्थ

08-03-21


6) लौट मैं आऊंगी

मर कर भी मैं 
पूरा पूरा कहां भला मर पाऊंगी
पेड़ की ही तरह कहीं मैं 
तुमको खडी नज़र आ जाऊंगी
छाया दूंगी या दूंगी फल 
बस यही कहने नहीं मैं पाऊंगी

उतरुंगी आंगन तुम्हारे
गौरईया बन कर फुदकूंगी
फुदकुंगी या गाऊंगी
बस यही कहने नहीं मैं पाउंगी

तेरे आंगन का दाना चुग चुग
किसी खेत के आंचल में बिखराऊंगी
अंकुर बन कर फूटेगा
धीरे धीरे पौध बनेगा वो
दाना देगा या पैरों को चुभेगा 
बस यही कहने नहीं मैं पाउंगी

मर कर भी मैं शब्द बीज की तरह 
नेपथ्य में फिर फिर दिख जाऊंगीं
तेरे दरस के खातिर प्रियम
फिर फिर लौट मैं आउंगी
जीओ हजारों साल तुम प्रितम
गीत यही बस मैं गाऊंगी
जितनी बार भी सांसों को पहने
इस धरा पे मैं आउंगी
यही बस दोहराऊंगी
जीओ हजारों साल तुम प्रितम
हर बार तुम्हारे प्रेम की अलख जलाए 
राह में तुम्हारे कहीं मैं मिल जाउंगी

~ सिद्धार्थ

आज लिख देती हूॅॅं

आज लिख देती हूॅं !

कल सूख कर शब्द, याद बनेगा

हम न होंगे फिर भी ...
हमारे न होने का ये विवाद बनेगा
वक़्त की धूल भी जम जाए अगर,
नजर पड़ी तो ! 

उठ के फिर फ़रियाद करेगा
तेरे आंखों को मेरी याद से 

यदा-कदा अवाद करेगा

आज लिख देती हूॅॅं

~ सिद्धार्थ
07-03-20

अपने होश संभालने से 
माँ के जाने तक,
मैंने जब भी माँ की तरफ देखा ,
मैंने सोचा ...  
उनके गले लग कर एक बार तो कह सकूं 
'मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूॅॅं माँ '
माॅं ! क्या तुम भी मुझसे प्यार करती हो ?
मगर मैं ऐसा कभी नहीं कर पाई
मैं उनके समीप जाने की कोशिश में 
हमेशा उनसे दूर होती रही 
मैं उस देह से उठती खुशबू में 
नहाने के लिए बेचैन रहती थी 
जिसका एक हिस्सा मैं भी थी 
मगर ऐसा हो न सका 
न जाने  वो क्या चीज थी जो रोकती थी मुझे
जब भी उनकी तरफ जाने को मन आतुर होता
धरती अपने गुरुत्वाकर्षण का कमाल दिखाती 
और मेरे पैर , जम से जाते 
मेरे हाँथों में पाला मार जाता 
मुझे याद नहीं माँ के बीमारी से पहले 
माँ के शरीर का स्पर्श कैसा रहा होगा
मुझे याद नहीं कि मेरे शरीर के किसी भी अंग को 
माँ ने कब अपने उंगलियों से छुआ हुआ होगा
माँ को हमेशा पास रहकर भी दूर से ही देखा
मैंने मां को बहुत बार 
बार-बार गले लगाया छुआ
उनसे रूठी भी, उनसे मानी भी
उनसे झगड़ा उनसे प्यार किया
मगर सब अपने ख्यालों में किया
मेरे ख़यालों में रहती साँस तक 
महकेंगी वो "मेरी माँ "
~ सिद्धार्थ 
***
तुम भूल जाना कि
जिंदगी के कैनवास पे
कोई पतली सी
हंसी की लकीर उभरी थी
जो तुम्हारी ओर देखते ही
सुर्ख हो जाया करती थी
तुम भूल जाना की
जिंदगी की तपती धूप में
तुम किसी के लिए
शीतल सांझ की तरह थे
जहां थोड़ी देर ठहरना और
थकान से झुके अपने कंधो को
सीधा करना चाहती थी
तुम भूल जाना की तुम्हारी पीठ पे
किसी दिन बच्चे की तरह झूल जाना
उसके जीवन के सुंदरतम सपनों में से एक था
तुम सब कुछ भूल जना
बस इतना याद रखना कि
किसी ने हंसते हुए दुनियां के सपने देखे थे
चारों तरफ हंसते और खुशहाल चेहरों की लहलहाती फ़सल के सपने देखे थे
तुम बस इतना याद रखना कि
वो सपने तभी पूरे हो सकते हैं
जब दुनियां में रोटी की कमी न हो
सूखे आंतों की हंसी
बहुत भयावह होती है मेरे दोस्त
रुदालियों के रुदन और उस हंसी में
कोई फर्क नहीं होता
तुम याद रखना
उसे बसंत के सपने आते थे
आम महुआ के मंजर की भिनी खुशबू
कोयल के मीठे तान और
सरसों के पीले फूल जवान गेहूं के बालों से अटखेलियां करते
उसे चूमते उसके गले लगते नजर आते थे
उसे सपने में सब हंसते
प्यार करते नजर आते थे
तुम उस हंसी को याद रखना ...
तुम उस प्यार को याद रखना
तुम याद रखना कि हंसता हुआ जहां बनाना है ...
तुम याद रखना प्यार भरा जहां बनाना है..
~ मुग्धा सिद्धार्थ














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