एक क्रांतिकारी ऐसा भी ( भगवती चरण वोहरा और दुर्गा भाभी )
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त उस समय गिरफ्तार हो चुके थे और लाहौर जेल में थे ।
बाहर जो क्रांतिकारी थे, वो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयासरत थे । उन्हीं में से एक थे भगवती चरण वोहरा जिन्हें 'बापू भाई' या 'बाबू भाई' भी कहा जाता था। कुछ क्रांतिकारी उन्हें भगत सिंह के परामर्शदाता भी कहते हुए दिखते हैं।
वो दुर्गा भाभी के पति थे। इन दोनों का आजादी के संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
उन लोगों ने निर्णय किया कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को हम ससस्त्र छुड़ा लेंगे ।
बमों और पिस्तौलों से लैस होकर पुलिस दल पर हमला करेंगे और भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त को छुड़ा लेंगे । जिसके लिए बम बनाए गए। अभी बम का परीक्षण होना बाकी था की बम कितना अधिक घातक सिद्ध होगा इसको जांचने के लिए
यह घटना लाहौर के रावी नदी के किनारे की है। इसके लिए भगवती चरण वोरा , सुखदेवराज और विश्वनाथ वैशम्पायन को चुना गया। उस वक्त आजाद वहां मौजूद नहीं थे। ये तीनों लोग 28 मई 1930 के सुबह 10 / 11 बजे के करीब बम लेकर निकलते हैं रावी नदी की ओर जहाँ बिना ज्यादा मशक्क्त के उन्हें नाव भी मिल जाती है क्यूंकि सुखदेव राज पंजाब यूनिवर्सिटी के बोट क्लब के सेक्रेटरी थे। नाव खेना बाबू भाई और सुखदेव राज दोनों जानते थे।
वे अपनी - अपनी साईकिल मल्लाह के घर छोड़ नाव लेकर रावी नदी के उसपार जंगल में पहुँचते हैं। रास्ते से उनलोगों ने एक तरबूज और कुछ संतरे भी खरीद कर रख लिए थे कि अगर भूख लगी तो इसी से काम चलाया जायेगा।
जंगल के अंदर जाकर एक गढ्ढे को देख निश्चित करते हैं हम यहीं पर बमों का परीक्षण करेंगे। जब विश्वनाथ झोले से बम निकालते हैं तो उन्हें पता चलता है बम का ट्रिगर हिल रहा है। वो कहते हैं अब परीक्षण कैसे होगा जिसके जबाब में बाबू भाई कहते हैं तुमलोग साईड हटो मैं देखता हूँ। करना ही क्या है बस फेंकना और देखना ही तो है की धमाका कितना जोरदार होता है। सुखदेव और वैशंपायन दोनों के मना करने के बावजूद वोहरा बम लेते हुए कहते हैं तुम लोग जाकर के पेड़ के पीछे छुप जाओ। लेकिन जैसे ही विश्वनाथ वैशंपायन के हाँथ से भगवती चरण बोरा बम अपने हाँथ में लेते हैं । और फेकने के लिए हाथ ऊपर उठाते हैं , बम हाॅंथ में ही फट जाता है । और चारो तरफ धुंआ फैल जाता है । धमाके के कारण सभी निचे गिर जाते हैं। थोड़ी देर में जब सुखदेव और वैशम्पायन जो एक एक पेड़ की आर में छुपे थे उठ कर बाहर निकलकर जब देखते हैं तो भगवती चरण बोरा निचे जमीन पर गिरे दिखते हैं । उनके एक हाँथ की कलाई उड़ चुकी होती है दूसरे हाँथ की सारी अंगुलियाँ कट कर गिर चुकी होती है । और पेट फट कर कुछ आंते भी बाहर झाँक रही होती है।विश्वनाथ वैशंपायन और सुखदेव राज दोनों अपने संस्मरण में यही लिखते हैं।
और साथ ही बम का एक टुकड़ा सुखदेवराज के बांए पैर में धंस कर पौर को जख़्मी कर चुका है। वैशंपायन सुखदेव राज को कहते हैं तुम किसी तरह साथियों तक पहुंचो और उन्हें सूचित करो बाबू भाई के स्थिति के बारे में।
यशपाल अपने संस्मरण में लिखते हैं कि उन्होंने ही बम बनाया था जिसमे से एक बम सूखा नहीं था उसका ट्रिगर हिल रहा था , जिसे सूखने के लिए आंगन में रख दिया था ये सोच कर की साम तक सूख जायेगा जिसे वो लोग अनजाने में ले गए।
सुखदेव वहां से निकलते हैं बहुत मुश्किल से किसी तरह उन्हें एक तांगा मिला तांगेवाले को उन्होंने कहा साइकिल से गिरकर चोट लग गई है। जिसके बाद वह किसी तरह पार्टी ऑफिस तक पहुंचते हैं। जब तांगा से कराहते हुए उतर रहे थे तो वहां आजाद और यशपाल दोनों थे सुखदेव ने कहा बम परिक्षण के समय दुर्घटना हो गई वो पुरी स्थिति नहीं बता सकते थे क्योंकि वहां उस वक्त दूर्ग भाभी और सुशीला देवी ( विश्वनाथ वैशम्पायम की पत्नी ) भी वहीं पर थीं।
फीर भी आजाद भांप चुके थे की कोई बड़ी दुर्घटना हुई है। इस लिए उन्होंने यशपाल को कहा जितना जल्दी हो सके वहां चिकित्सकीय इंतजाम करो।
उधर बाबू भाई की हालत बहुत गंभीर थी विश्वनाथ लिखते हैं 'पैंट और गंजी छोड़ कर मेरे देह पर जितने कपड़े थे उससे उनके ज़ख्मों को बांधने लगा जिस से खून का बहना बंद हो सके, लेकिन खून का बहना बन्द नहीं हो सका'
सुखदेव और वैशंपायन दोनों लिखते ही लिखते हैं कि तीन घंटे तक वहां मदद नहीं पहुंच सकी जबकि वहां से अड्डे की दूरी महज एक घंटे की थी।
वैशंपायन जो कर सकते थे वोहरा के लिए वो करने का प्रयास करते रहे । उन्होंने पानी मांगा तो साथ में लाए संतरा का रस निकालकर कर दिया पास ही एक गड्ढे में पानी था जिसे वो अपने हैट में भर कर लाते और लगातार उनके मुंह में टपकाते रहे ताकि 'बाबूभाई' होश में बने रहें। वैशंपायन लिखते हैं मैंने जब बाबू भाई को कहा आपने ये क्या कर दिया ? हम लोगों को करने देते ? उन्होंने कहा "अगर तुम दोनों में से किसी को कुछ हो जाता तो मैं भैया ( आजाद) को मैं क्या मुॅंह दिखाता ? विश्वनाथ लिखते हैं उस समय भी वो (भगवती चरण वोहरा) मुस्कुरा रहे थे।
यशपाल और छैलवीहारी घटना के 3 घंटे बाद जब वहां गाड़ी लेकर पहुंचे थे तो ये सोचा कि भगवती चरण वोहरा (बाबू भाई ) को इसी से अस्पताल तक ले जायेंगे, मगर उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी की उन्हें गाड़ी में बिठाकर ले जाया जाता। तब यशपाल और वैशंपायन छैल बिहारी को वहां पर भगवती चरण वोहरा का देखरेख करने के लिए छोड़ कर शहर की ओर लौटे ताकि कुछ दवाइयों का इंतजाम किया जा सके। ये लोग जब वहां अस्पताल में पहुंचे तो वहां अज्ञेय के भाई ब्रम्हानंद अपनी पढ़ाई कर रहे थे। उनके मदद से कुछ दवाइयां इकट्ठा की गई और ब्रह्मनंद ने कुछ चादरें और स्ट्रेचर का भी इंतजाम कर ली और सभी को साथ लेकर 'बाबू भाई ' के पास तीनों लोग जाने के लिए निकल गये। जब वहां पहुंचे तो देखा छैल बिहारी वहां नहीं था बाबू भाई अंतिम सांस ले चुके थे। जिससे डरकर छैलबिहारी भाग चुका था।
जो चादर उन्हें लपेटकर अस्पताल ले जाने के लिए आया था उसी में बांधकर के लाश को वहीं पर छोड़ वह लोग पार्टी ऑफिस लौट आए। सभी को बताया गया कि भगवती चरण वोहरा अब नहीं रहे स्थिति ऐसी थी कि कोई रो भी नहीं सकता था।
दुर्गा भाभी के दुख को कोई नहीं समझ सकता अपना सब कुछ लुट जाने के बावजूद भी उन्होंने एक आंसू नहीं बहाया पूरी रात चुपचाप बैठी रहीं। उनके साथ ही सुशीला देवी और धनवंतरी जो पार्टी के कार्यकर्ता थे वे भी बैठे रहे।
रोने की आवाज से बाहर लोगों को पता चल जाता कि कोई घटना हुई है। और यह ज्यादा बुरा होता इसके कारण बाबू भाई के मरणोपरांत उनके चाहने वाले रो तक नहीं पाए।
वैशंपायन ने लिखा है आजाद दुर्गा भाभी के पास गए और उन्होंने कहा "तुमने पार्टी के लिए और अपने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। तुम्हारे प्रति हम अपना कर्तव्य कभी नहीं भूलेंगे'
जब सुबह होने वाली थी तो चंद्रशेखर आजाद ने कहा हमें बाबू भाई का अंतिम संस्कार करने के लिए जाना है । सुशीला देवी और दुर्गा भाभी दोनों जिद करने लगी कि वह भी साथ जाएंगी लेकिन आजद यह कहते हुए रोक देते हैं कि सुबह सुबह दो औरतों के साथ रावी नदी की ओर जाते हुए और उसे पार कर जंगल में जाते हुए देख कर लोग शंका करेंगे सैकड़ों सवाल पूछेंगे। और यह सही नहीं होगा भगवती का बलिदान व्यर्थ चला जायेगा।
धनवंतरी और मदन गोपाल को साथ लेकर आजाद भगवती चरण वोहरा के अंतिम संस्कार करने के लिए चले जाते हैं। लाश को जलाई नहीं जा सकती थी। धुंआ देख कर के लोगों के इकट्ठा हो जाने का अंदेशा था। रावी नदी में लाश को बहाया नहीं जा सकता था क्योंकि गर्मी का समय था और नदी में पानी बहुत कम थी । इसीलिए वहीं पर गड्ढा करके उन्हें दफना दिया गया । बाद के दिनों में अंग्रेजों को मुखबिररों से पता चल गया इस घटना के बारे में और उन उनके कंकाल को खोद करके निकाला गया। और सभी पर मुकदमा भी चला
दुर्गा भाभी को भगवती चरण वोहरा के शहादत के बाद घोर विपत्ति का सामना करना पड़ा। उनके मकानों को अंग्रेजों ने जब्त कर लिया बोहरा के जो देनदार थे उन्होंने ने पैसे वापस करने से साफ इन्कार कर दिया।
मुआवजा लेकर आप क्रांति नहीं कर सकते। मुआवजा मतलब आपने सुलह कर ली ...
अब मुआवजों वाली क्रांति होती है
~ सिद्धार्थ
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