बाइस्कोप
मेरे बचपन में जहां अन्य बच्चों को टीवी देखना, मेला घूमना, खेलना-कूदना पसंद था । वहीं मुझे बाइस्को देखना पसंद था।
हफ्ते में शायद एक या 2 दिन ठीक से कुछ याद नहीं, पर ठीक दूपहरी में वो कंधे पर टीन का एक बक्सा लटकाए डमरु डूगडुगाते हुए गांव के एक सरहद से प्रवेश कर गली गली में घूमते हुए दूसरी सरहद से निकल जाता था।
जहां से भी वो गुजरता कुछ बच्चे एकजुट होकर देखने लग जाते और कुछ पैसे उसके हाथों पर रख अपने अपने घर चले जाते।
लेकिन मेरा कुछ अलग ही मामला था। मैं हर रोज दिन चढ़ने के साथ ही उसका इंतजार करने लगती। उस समय अधिकतर घरों में दीवार घड़ी नहीं हुआ करती थी। सो हमारे घर में भी नहीं ही थी और हाथ की घड़ी को देखना मुझे तो आता ही नहीं था। बड़े होने पर, बहुत मशक्कत से सीख पाई थी।
लेकिन बालमन में बैठा हुआ डमरू का डूग डूग और बाइस्कोप का सपनों का संसार समय को समझने की कला में मुझे निपुण कर दिया था।
या ये कहना ज्यादा यथोचित होगा कि सभी बच्चे अपने किसी प्रिय खेल के समय को समझने में यूं ही निपुण हो जाते हैं । इसे मैं अब भी नहीं समझी जिसका भी अपना अलग ही कारण है। खैर ...
मैं समझ जाती थी अब उसके आने का समय हो गया है। उस समय घर की सारी औरतें और वो बच्चे जो अभी स्कूल जाना शुरू नहीं किए रहते वो खा पी कर सोए ही रहते थे।
मगर मेरी ऑंखों में नींद नहीं वो दृष्य़ घूमता रहता जो उस डब्बे में बंद था और कानों में डमरू और बजाने वाले की लयकारी पुकार।
कामकाजी मर्द अपने अपने कामों पर और घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य मेरे बाबा अपनी कोठडी में ही एक डायरी पर राम-राम लिखते रहते थे।
मैं बिना आहट किए हुए निकल पड़ती उस दिशा की ओर जिस दिशा से वो आता था। दौड़ते दौड़ते मेरे पांव थक जाते, सांसें उखड़ने लगती थी फिर भी बिना कहीं रुके मैं भागती जैसे पैरों में पवन ने अपना पायल पहना दिया हो आगे ही बढ़ती जाती।
जिस दिन भी उसका आने का दिन होता वह रास्ते में ही कहीं मिल जाता था। और मेरे घर तक आने के दरमियां जितनी बार भी वो अन्य बच्चों को बाइस्कोप दिखाता उतनी बार मुझे भी दिखाता और अंत में कहता 'बबुआ बड़का मालिक से कहि देबई कि आई अहां देखने छलीअई'
मैं हंसते हुए बाबा के कोठडी में भाग जाती।
बाबा पूछते 'की भेल?
मैं ' लेखली' "बचपन में मैं द को ल बोलती थी" ! इतने उत्साह से बोलती कि बाबा स्वतः ही समझ जाते, 'अच्छा ई बात हई' और हंसने लगते। और मैं भागते हुए जाकर जहां सभी बच्चे सोए होते वही दुबक कर चुपचाप सोने का अभिनय करने लगती।
मैं कभी नहीं समझ आज उनका आने का दिन नहीं।
जिस दिन उनका आने का दिन नहीं होता उस दिन भी मेरा कार्यक्रम यही रहता। मैं भागते हुए उसी रास्ते की ओर बढ़ती जाती। कभी कभी भागते भागते अपने गांव के सरहद को पार कर अगले गांव में पहुंच जाती और थककर बीच सड़क पर पालथी मारकर बैठ जाती थी। कई बार ऐसा हुआ कि वो उसी गांव में मिल जाते, मगर मुझमें इतनी हिम्मत नहीं होती कि मैं उठकर उसे देखूं जिसके लिए इतनी थकान को खुशी-खुशी मोल लिया था मैंने । बस नीरीह नजरों से वहीं बैठे बैठे ही उस डब्बे को घूरती रहती। जैसे कई दिनों का भूखा प्यासा इनसान खाने से भरी थाली को देख तो रहा हो मगर उसमें इतनी-सी भी जांगड न बची हो की हाथ बढ़ा कर निबाला मुंह में डाले और भूख से ही उसका प्राण पखेडु उड़ जाय।
वह पास आकर पूछते भी 'बबुआ देखे के नई छौ की ? मैं बिना कुछ बोले अपने सामने पड़े मिट्टी के ढेले, कंकर, पत्थर को उठा उठा कर इधर-उधर फेंकती रहती।
खेत से लौटते मजदूर मुझे वैसे बैठा देख गोद में उठा लेते और पूछते ' बऊआ अहां मुखिया जी के पोती छिअई न ?
मैं कुछ भी नहीं बोलती। क्योंकि मैं जानती होती थी कि वो मुझे जानते हैं।
वो मुझे रास्ते भर नसीहत पिलाते कि 'बऊआ अकेले कहीं नई जाय के चाही। लकड़बग्घा घूमई छैई, उठा के ले जायत। बच्चा चोरबा सब दिया नई सुनली की अंहां ? फलना गांव से फलना के बच्चा ल गेलई हॉंथ पैर काईट क बेच देलकई।'
इसी तरह की ढेरों बातें और मैं चुपचाप अनसुना करती रहती। मेरे उस छोभ को कोई समझ ही नहीं सकता था जो मुझे बाइस्कोप नहीं देख पाने के कारण मुझमें उपजा था।
घर पहुंच कर वह बाबा के कोठरी के बाहर से ही आवाज लगाते 'बड़का मालिक
बाबा खड़ाऊ खटखटाते हुए बाहर निकलते और देखते मैं उनेके गोद में हूं। तुरंत ही पूछ बैठते
'की भेलई गिर गेलई की ?
वो बोलते नई नई मालिक बऊआ आई फेर बिच रोड में बैईठल छलखिन, उ तो हम देख लेलीअई नई त की जाने आई की होईती
बाबा बोलते ' मार बेहूदा के, की होतीअई रे ? केकर हिम्मत जे फलनमा के बेटी के कुछ क दीत'
मैं समझ जाती अब बाआ और गर्मा जाएंगे मैं गिलहरी के तरह उनके गोद से उतर के बाबा के धोती से लिपट जाती और रोने लगती 'लेखू न हम आई नई लेखली। " मैं बचपन में द का उच्चारण ल करती थी"
अब बाबा मुझ पर बरसने लगते नई जाने ओई टीन के डिब्बा में आ ओई डमरु में कौन जादू मंतर हई जेकरा पीछे तूं पगगलायल रही छ, एतना देर हमरा साथे बईठतअ त आई तक राम लिखे आ जईतओ
मैं बोलती 'कल्याण लेखबई' इतने में मुझे सही सलामत पहुंचाने वाले को निकल भागने का मौका मिल जाता और मैं बाबा के साथ कल्याण के चित्रों को देखने में व्यस्त हो जाती। उसके पन्ने इतने मुलायम होते जैसे सुर्खाब के पर हों और चित्रों के रंग इतने सुन्दर कि लगता वो सब के सब अभी मुर्त रुप ले लेंगे
आज सोचती हूं तो लगता है कि बाबा का वही कल्याण मुझे किताबों से प्रेम करना सिखा पाया था।
और बाईसकोप वाले के उस डमरू के डूग डूग ने अपने सपने के पीछे भागना जिससे अब तक उबर नहीं पाए हूॅं ।
~ सिद्धार्थ
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