क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास (चापेकर बंधुओं से भगत सिंह तक)

 स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों के प्रवेश की घोषणा करने वाला पहला धमाका 1897 में पुणा में चाफेकर बंधुओं ने किया था।

 पूना शहर में उन दिनों प्लेग जोरों पर था। रैंड नाम के एक अंग्रेज को वहां प्लेग कमिश्नर बना कर भेजा गया। वह बड़ा ही जालिम और तानाशाह किस्म का आदमी था। उसने प्लेग से प्रभावित मकानों को बिना कोई अपवाद खाली कराए जाने का हुक्म जारी कर दिया। जहां तक उस हुक्म का सवाल है उसमें कोई गलत बात नहीं थी। लेकिन जिस तरह रैंड ने इस पर अमल करवाया उससे वह अलोकप्रिय हो गया। लोगों को उनके घरों से निकाला गया है और उन्हें कपड़े बर्तन आदि तक ले जाने का समय नहीं दिया गया।

4 मार्च 1897 को लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र केसरी में एक लेख लिखकर ना सिर्फ नीचे के अफसरों पर बिल्कुल बल्कि खुद सरकार पर एक इल्जाम लगाया कि वह जानबूझकर जनता को उत्पीड़ित कर रही है । उन्होंने रेंट को निरंकुश बतलाया और सरकार पर दमन का सहारा लेने का आरोप लगाया।

फिर आया शिवाजी समारोह इस अवसर पर 12 जून 1897 को एक सार्वजनिक सभा में अध्यक्ष पद से बोलते हुए तिलक ने कहा : 'क्या शिवाजी ने अफजल खान को मारकर कोई पाप किया था ? इस प्रश्न का उत्तर महाभारत में मिल सकता है ।गीता में श्रीकृष्ण ने अपने गुरुओं और बंधुओं तक को मारने का उपदेश दिया है। उनके अनुसार अगर कोई व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करता है तो वह किसी भी तरह पाप का भागी नहीं बनता है।

 श्री शिवाजी ने अपने उदर पूर्ति के लिए कुछ भी नहीं किया था। बहुत ही नेक इरादे के साथ दूसरों की भलाई के लिए उन्होंने अफजल खान का वध किया । अगर चोर हमारे घर में घुस आए और हमारे अंदर उनको बाहर निकालने की ताकत ना हो तो हमें बेहिचक दरवाजा बंद करके उन को जिंदा जला देना चाहिए । ईश्वर ने हिंदुस्तान के राज्य का पट्टा ताम पत्र लिखकर विदेशियों को तो नहीं दिया है। शिवाजी महाराज ने उनको अपनी जन्मभूमि से बाहर खदेड़ने की कोशिश की । ऐसा करके उन्होंने दूसरों की वस्तु हडपने का पाप नहीं किया । कुएं के मेंढक की तरह अपनी दृष्टि को संकुचित मत करो, ताजीराते - हिंद की कैद से बाहर निकलो, श्रीमद्भगवद्गीता के अत्यंत उच्च वातावरण में पहुंचो और महान व्यक्तियों के कार्यों पर विचार करो"

 और 22 जून को चापेकर भाइयों ने रैंड व ऐवर्स्ट को मार दिया । इस तरह ऊपरी तौर पर देखने से यही लगता है कि चापेकर भाइयों के कार्य के तत्कालिक प्रेरक तत्व रैंड की निरंकुशता और तिलक का भाषण थे । लेकिन यह सिर्फ अर्धसत्य है । दरअसल चाफेकर बंधुओं के विचार महामारी फैलने या रैंड के पुणा आने से बहुत पहले से ही एक शक्ल अख्तियार करने लगे थे।

1894 में ही चापेकर भाइयों ने पुणे में शारीरिक और सैनिक प्रशिक्षण के लिए 'हिंदू धर्म अवरोध निवारण समिति' कायम कर रखी थी जिसे 'हिंदू संरक्षण समिति' भी कहा जाता है यह समिति हर साल नियम पूर्वक शिवाजी व गणपति समारोह आयोजित करती थी । इन समारोहों में चापेकर भाइयों द्वारा पढ़े जाने वाले श्लोकों से उनकी भावना का पता चलता है । जनता से तलवार उठाने का आग्रह करते हुए शिवाजी श्लोक कहता है : भांड की तरह शिवाजी की कहानी दुहराने मात्र से स्वाधीनता प्राप्त नहीं की जा सकती ।आवश्यकता इसकी है कि शिवाजी और बाजी की तरह तेजी के साथ काम किए जाएं । आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़नी चाहिए यह जानते हुए कि हमें राष्ट्रीय संग्राम के युद्ध क्षेत्र में जीवन का जोखिम उठाना होगा । हम धरती पर उन दुश्मनों का खून बहा देंगे जो हमारे धर्म का विनाश कर रहे हैं हम तो मार कर मर जाएंगे लेकिन तुम औरतों की तरह सिर्फ कहानियां सुनाते रहोगे ।

गणपति श्लोक तो शिवाजी श्लोक से भी ज्यादा उग्र था और धर्म की रक्षा के लिए उठ खड़े होने का आवाहन करते हुए उसमें हिंदुओं से कहा गया : 'अफसोस तुम गुलामी की जिंदगी पर शर्मिंदा नहीं हो । जाओ आत्महत्या कर लो । उफ़ ! यह कमीने कसाइयों की तरह गाय और बछडों को मार रहे हैं ;  उसे ( गो को ) उस संकट से मुक्त कराओ ; मरो लेकिन अंग्रेजों को मारकर ; नपुंसक होकर धरती पर बोझ ना बनो । इस देश को हिंदुस्तान कहा जाता है ; अंग्रेज भला किस तरह यहाॅं राज कर सकते हैं ?

 इस तरह हम देखते हैं कि चापेकर बंधु और उनके सहयोगी मुख्यतः तीब्र धार्मिक भावनाओं से उत्प्रेरित थे और उनका दृष्टिकोण और कट्टरपंथी था । संभवत इसी कारण से वे ब्रिटिश विरोधी ही नहीं मुस्लिम विरोधी भी थे । चाफेकर बंधुओं की देशभक्ति हिंदुत्व पर आधारित थी वह हिंदू धर्म और गो की रक्षा के लिए अंग्रेजों को बाहर भगाना चाहते थे रेंज की हत्या भी एक ऐसे व्यक्ति के प्रति उनकी गहरी नफरत का नतीजा थी जो अपने दम पर निरंकुशता की कार्यवाही के कारण पूरी जनता की घृणा का पात्र बन गया था।

 जहाॅं तक उनको प्रेरित करवाने करने वाले दूसरे कारणों का सवाल है, इसका कोई सबूत नहीं मिलता कि वह 1857 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम से या फ्रांसीसी व इतालवी क्रांतिकारियों से प्रभावित रहे हों ।

इन तमाम सीमाओं के बावजूद मुकदमे के दौरान या बाद में चापेकर भाइयों ने जिस वीरता साहस और बलिदान की भावना का परिचय दिया उसके महत्व को किसी भी तरह कम करके आंका नहीं जा सकता । सर ऊंचा किए हुए तीनों भाइयों ने फाॅंसी के फंदे को चूम लिया।

 गुलामी और आज़ादी की समस्याओं के प्रति या धार्मिक दृष्टिकोण चापेकर भाइयों तक ही सीमित नहीं था । सावरकर बंधु भी धार्मिक रहे बंगाल के क्रांतिकारियों ने भी धर्म के सहारे लोगों को उभाडा था। इस वाक्य से शायद यह गलतफहमी हो कि वे धर्म को न मानते थे केवल उभारने का काम उससे लेते थे। इसलिए यह कह देना जरूरी है कि वे स्वयं धर्म के कट्टर मानने वाले थे ।

1902 में कोलकाता के कायम अनुशीलन समिति की कार्य प्रणाली का वर्णन करते हुए तारिणीशंकर चक्रवर्ती लिखते हैं : 'क्रांतिकारी कार्य के लिए जो इस सीमित में आते थे, उन को दो भागों में बांटा जाता था। धर्म में जिनकी आस्था थी उनको एक वर्ग और धर्म विशेष में जिन्हें आस्था नहीं थी , परंतु क्रांतिकारी कार्य में विशेष निष्ठा थी, ऐसे लड़कों को दूसरे वर्ग में रखा जाता था। धर्म के प्रति जो श्रद्धावान थे वे इस बगीचे ( मानसिक तल्ला बागान ) में रहते थे ... ये ही लड़के प्रथम कोटि के क्रांतिकारी समझे जाते थे।

उस समय बंगाल के क्रांतिकारियों का बहुमत बंकिमचद्र चटर्जी और स्वामी विवेकानंद से बेहद प्रभावित था। 'अनुशीलन समिति' के सदस्यों को हिंदू ग्रंथों, खासकर गीता को बहुत ध्यान से पढ़ना पड़ता था।

"बंकिम चंद्र चटर्जी और स्वामी विवेकानंद की बौद्धिक परंपरा में पले बढे बंगाल के बीसवीं सदी के पहले दशक के क्रांतिकारी धार्मिक उपादानों और कर्मकांड से तथा प्राचीन व तत्कालिक हिंदू के पौराणिक उपाख्यानों, प्रतीकों, गीतों और नारों से प्रेरणा ग्रहण करते थे"

इस तरह क्रांतिकारी आंदोलन के पहले चरण 1897 से 1913 के क्रांतिकारी आमतौर पर हिंदू धर्म के प्रति आस्थावान थे । और उनसे प्रेरणा ग्रहण करते थे । यह कोई आकस्मिक बात नहीं थी। इसके ऐतिहासिक कारण थे। पिछली सदी के आठवें दशक में तरुण भारत के दिलों को एक नई भावना मथ रही थी । शिक्षित युवक राजनीतिक दृष्टिकोण से सोचने लगे थे । एक नई किस्म का राष्ट्रवाद जन्म ले रहा था । यह नया राष्ट्रवाद पुराने राजनीतिवाद के मुकाबले ज्यादा संजीदा ज्यादा खुले दिमाग वाला था। यह इस विचार से लैस और प्रेरित था कि पूरे राष्ट्रीय जीवन का पुनरुत्थान आवश्यक है। भारतीय मानस किस सीमा तक आंदोलित हो उठा था , इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि सभी बेहतरीन सोच के लोगों की नई भावनाएं और विचार धर्म से अनु प्रमाणित थे । पुराने देवताओं की जगह घृणा और रक्त के नए देवताओं की पूजा होने लगी थी।

इस सीमा तक धर्म की एक सकारात्मक भूमिका अवश्य थी । लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू भी था। इस दौर में बाल गंगाधर तिलक , बिपिन चंद्र पाल , ब्रह्म बांधव उपाध्याय और अरविंद घोष जैसे जुझारू राष्ट्रीय नेता राजनीति को धर्म के रंग से रंग रहे थे । इस तरह अचेतन रूप में ही सही उन्होंने सांप्रदायिक राजनीति के विष वृक्ष लगाए । गांधी और उनके अनुयायियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और अंत तक उससे चिपके रहे। जबकि क्रांतिकारियों ने 1914 में ही जब उनका आंदोलन दूसरे चरण में प्रवेश कर रहा था, इसे छोड़कर धर्मनिरपेक्षता को अपना लिया था । धर्म और राजनीति का यह तालमेल तब से आज तक लगातार हमारे सार्वजनिक जीवन को तबाह करता रहा है । और अब इसके कारण हमारी राष्ट्रीय एकता का ढांचा चरमराता नजर आ रहा है।


हालांकि महाराष्ट्र के चापेकर बंधु और बंगाल के पहले दशक केक्रांतिकारी , दोनों प्राचीन भारतीय संस्कृति से प्रेरणा ग्रहण करते थे लेकिन दोनों के बीच एक मार्के का अंतर भी है।

30 अप्रैल 1960 को किंग्सफोर्ड की बग्घी पर एक बम आकर गिरा जिससे 2 महिलाओं का की मृत्यु हो गई । इस घटना पर टिप्पणी करते हुए 22 जून के केसरी में लोकमान्य तिलक ने लिखा " 1897 की हत्या और बंगाल के इस बम कांड के बीच काफी अंतर है । जहां तक दिलेरी और कार्यकुशलता पूर्वक संपन्न करने का सवाल है चाफेकर भाईयों का दर्जा बंगाल की बम पार्टी के सदस्यों से ऊंचा है । लेकिन अगर साध्य और साधन के नजरिए से देखें तो बंगालियों की ज्यादा तारीफ करनी होगी ... वर्ष 1897 में पूना निवासी प्लेग के समय के दमन के शिकार थे । और उस दमन से उत्पन्न उत्तेजना का कोई शुद्ध राजनीतिक चरित्र नहीं था । यह शासन प्रणाली ही खराब है ।और जब तक अधिकारियों को छांट छांट कर व्यक्तिगत रूप से आतंकित नहीं किया जाता, तब तक व्यवस्था को बदलने पर तैयार नहीं होंगे ऐसा कोई महत्वपूर्ण प्रश्न चापेकर भाइयों के सामने नहीं था । उनका कर्म प्लेग के बाद जारी दमन के यानी एक विशेष कार्य के खिलाफ था । निश्चय ही बंगाल की बम पार्टी की दृष्टि एक ज्यादा व्यापक पटल पर थी जिसे बंगाल के विभाजन ने उभारा था।"

 इतना ही नहीं बंगाल के क्रांतिकारी धर्म को बहुत ज्यादा महत्व देते थे ‌। इस तथ्य के बावजूद आंदोलन के अंतिम लक्ष्य की दृष्टि से कहे तो,  1902 में उन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण घोषणा की थी इसी वर्ष बंगाल के क्रांतिकारियों ने अपने को 'अनुशीलन समिति' नाम की एक पार्टी के रूप में संगठित किया था । समिति की स्थापना के समय जारी घोषणापत्र में कहा गया था : "अनुशीलन की कल्पना से समाज में अनपढ़ गरीब लोग नहीं होंगे, कायर, दुष्ट लोग नहीं होंगे और अस्वस्थ लोग भी नहीं होंगे । ऐसे समाज के निर्माण के लिए सभी प्रकार की विषमताओं को समाप्त करना होगा विषमता के बीच मानव कि मानवता विकसित नहीं हो सकती मानव समाज से धन की विषमता, सामाजिक विषमता, सांप्रदायिक विषमता और प्रादेशिक विषमता दूर कर सभी मनुष्यों में समान लानी होगी । केवल राष्ट्रीय सरकार द्वारा ही ऐसा किया जाना संभव है । पराधीनता की दशा में अनुकूलन के स्वप्न के समाज की स्थापना संभव नहीं है , इसीलिए अनुशीलन पराधीनता के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करती है । अनुशीलन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता चाहती है।"

अनुशीलन समिति की यह घोषणा निश्चित ही आगे की तरफ एक बहुत बड़ा कदम था । यहीं पर बंगाल के क्रांतिकारी 1897 के पुणा केंद्र से आगे हैं । चापेकर बंधु विदेशियों से नफरत तो करते थे मगर वे खुद क्या चाहते थे इसके बारे में स्पष्ट नहीं थे । यह बात बंगाल के क्रांतिकारियों के साथ नहीं थी । ये लोग मुस्लिम विरोधी भी नहीं थे, हालांकि वे धार्मिक लोग थे और हिंदू धर्म ग्रंथों से प्रेरणा प्राप्त करते थे।

इसके विपरीत इस दौर के पंजाब के क्रांतिकारी आरंभ से ही सांप्रदायिकता के दोष से मुक्ति थे सरदार अजीत सिंह, लालचंद फलक, सूफी अंबा प्रसाद , लाला हरदयाल और उनके सभी सहयोगी धर्मनिरपेक्ष थे । धर्म उनके लिए एक निजी मामला था । 

शताब्दी के पहले दशक के क्रांतिकारी जिन स्रोतों  से प्रेरणा ग्रहण करते थे उनमें धर्म के अलावा एक एक था "1857 का भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम " इस विषय पर 1907 या 1908 में लंदन में लिखी गई वीर सावरकर की पुस्तक ने अपनी तमाम अपर्प्रयाप्याताओं के बावजूद , जो उस दौर में और उस समय के हालातों में स्वाभाविक थी,बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की । इस विषय पर ब्रिटिश साम्राज्यवादी लेखकों द्वारा फैलाए गए लांक्षणों तथा अनेक झूठे ऐतिहासिक लेखन की धज्जियां उड़ा कर इस पुस्तक ने बहुत बड़ा काम किया। इसने बातों को सही तौर पर सामने रखा ।इस किताब पर ब्रिटिश शासकों ने फौरन प्रतिबंध लगा दिया लेकिन फिर भी यह मेहनत से और गुप्त रूप से तैयार की गई पांडुलीपी के रूप में भारत के उस समय के क्रांतिकारियों के बीच घूमती रही

वास्तविकता यह है कि 1857 का जन विद्रोह पूरे स्वाधीनता संग्राम के दौरान सभी स्वाधीनता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहा ।शताब्दी के पहले दशक में क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का दूसरा स्रोत था फ्रांसीसी इतालवी और रूसी क्रांतिकारियों की कहानियां।

( भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज पृ सं 19 से 23)

~ मुग्धा सिद्धार्थ











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