मुझे याद है

 मुझे याद है 

मैंने कहा था सांप! 

उसने सुना था आप

मैंने फिर कहा! इन्हें नाप

उसने कहा! अरे ना

हाथ जोड़कर करो जाप


मैंने झल्लाकर फिर कहा 

ये हैं श्राप

उसने फिर कहा अरे नहीं

अरे ये तो हैं हमारे बाप

 मैंने कहा देखो तो चहुंओर 

 अविश्वास की हवा चली

 भूख की है आग लगी

 रोजगार की खेत जली

 उसने कहा देखो तो 

 धर्म की कैसी जोत जली

 देशभक्ति की शीतल बयार चली

 

 तभी! 6 वर्ष की बेटी ने

 धोती खींचते हुए उन्हें ये कही

 'बाबा क्यूं फिर 4 दिन से 

 अपने घर के चूल्हे पे 

 नहीं कोई पतीली चढ़ी

 अंदर चल कर देखो तो

 मां धरन से क्यूं झूल रही

 नाक का लैंग पायल - बिछिया

 सब बिस्तर पर क्यों छोड़ चली'


मुझे याद है मैंने कहा था

संसद से उठती हवा हमें 

मानसिक दासता के

सडन की ओर ले चली

~ सिद्धार्थ


 2;  हे ईश्वर


मैंने देखा 

लोगों की तनी हुई थी भौंएं

सना हुआ था हाॅंथ खून से

बिखरी हुई थी लाशें चारों तरफ 

लाशों के पेट फाडे गए थे 

तलाशी ली गई थी

कुछ मुट्ठी चावलों की 

जो उनके किन्हीं अपनों के लाशों पर

अंतिम क्रिया के विधि के दौरान फेंकी गई थी

मैंने सुना ...  पेट फाड़े और लाश होने के बीच 

वो लोग ईश्वर को पुकार रहे थे ... 'हे ईश्वर'

मैंने देखा !

ईश्वर उनकी पुकार सुनकर आया था

और उनके फटे हुए पेटों से निकले

रक्त के नदी में कूद कर आत्महत्या कर चुका था

मैंने देखा ... ईश्वर मर चुका था 

मैंने देखा ... ईश्वर के मरते ही मैं जाग चुकी थी

हे ईश्वर

~ सिद्धार्थ

3; हे देवताओं 


हे देवताओं 

कभी किसी रात 

क्यूं नहीं उचटती तुम्हारी नींद

जब भूख से बिलखते बच्चे

अपनी माॅंओं की 

सूखी छातियों में ढूंढ़ते हैं दूध

जिव्हा के सतह पर जीवन रस का माधुर्य

न उतरते देख जब होते हैं विह्वल 

करते हैं अंतर्नाद

जिन्हें सुन लेता है

गलियों में घूमता कोई आवारा कुत्ता

और गर्दन को आसमान के दिशा में मोड़ 

भूकने लगता है भौ ... भौ 

अंधेरी गलियों की खाशोशी के 

हो जाते हैं टुकड़े सौ ... सौ

उच्ट जाती है गहरी नींद में सोए मनुष्यों की नींद

तो क्या तुम मनुष्यों से भी गए बीते हो ???

तो क्या तुम पालक गुण से भी रीते हो ???

तब फिर तुम किसी के लिए

 किस विधि दैव सरीखे हो ???

~ सिद्धार्थ

4;  वो अबला


एक कंधे पे है बदरंग सा थैला 

दूजे कंधे पर जहां-तहां से फटा आंचल मैला

एक हाथ में बांस की कमची थामें

दूजे हाथ में कनस्तर मटमैला

कोख के जेब में बडे जतन से जीवन धन को था उसने संभाला

कचरा बीन रही थी सांवली सी वो अबला

जाने मन ही मन क्या गिन रही थी वो अबला


मैंने तनिक रुक कर पूछा ... 

कुछ खो गया है या कुछ हो गया है

झटके से उसने मुझको देखा

मुंह फेर फिर धीमे स्वर में बोली

बीन रही हूं जो है किस्मत में लेखा

क्या तुमने कचरे में है कभी निवाले को देखा

हम लोगों के खाली खोली के 

अंधियाले दिल को है देखा

जीवन किस को कहते हैं 

क्या कभी तुम लोगों ने है करीब से देखा 

क्या तुम लोगों ने झूग्गी झोपड़ी के बदबू में 

जलते कलेजे के भाती में 

सिकते किसी गरीब की रोटी को है देखा

कौड़ियों के भाव में बिकते 

किसी की बोटी को है देखा

या छाती पर मास चढ़े बिना ही 

बाजार में उतरते किसी की बेटी को है देखा


कंठ में मेरे मानो सौ मन मिर्ची घुल गई हो

सांस अपना कर्म करना भूल गई हो 

कांप गई मैं अन्दर तक सुन कर

झुक कर पकड़ लिया दीवार  

प्रश्न को मन ही मन दूबारा धुन कर

तनिक सम्भल कर मैंने फिर बोला

सरकार के आगे तुम लोग रह जाती हो

भला क्यूं  कर अबोला


लगी जोर से ठहाका लगाने

मेरे प्रश्न में छिपे सार को

ठहाकों के नीचे दबाने 


पास ही एक कुत्ता चीप्स का पैकेट टटोल रहा था 

लगी साथ ही उसे कमची से भगाने


झुक कर उसने बड़े गर्व से पैकेट को उठाया

आंचल से उसका सारा धूल झार कर हटाया


झार झार के उसमें से जो भी निकला 

उसने उसको निर्विवाद ही निगला


उस छन जो था उसके चेहरे पे नूर

लगा मंदिर की सारी देवियां हैं इस के आगे बेनूर


बरबस ही वो फिर बोल पड़ी

'मदारी है साले सब के सब हर पांच साल में खेल दिखाने आते हैं

हमारी आंखों के बंजर जमीन में सपने वो बो जाते हैं 

पर बाढ़ सुखाड़ से उसे कभी नहीं बचाते हैं

हम लोग भी सदियों से दर्शक दीर्घा में ही बैठे हैं

मगर सुनो ... भूखे पेट भी हम एठे है'

अर्धमुर्छा में ही मैं बस उसे सुनती रही

उसके हर एक शब्द को मन ही मन धुनती रही


~ सिद्धार्थ

मैं ! मैं ईश्वर हूॅं 

मैं ही तो हुॅं जो सब करा रहा हूॅं

घबराते क्यूं हो ? 

प्रियजनों को पास बुला रहा हूॅॅं

मुझ से होकर ही आए थे

मुझ से होकर ही लौटोगे

घबराते क्यूं हो?

भागते कदमों में मैं हूॅं

ठहरे हुए जीवन में भी मैं हुॅं

पीठों पे पड़ती लाठी में मैं हूॅं

सांझ के दिया बाती में मैं हूॅं

घबराते क्यूं हो ?

सेठों साहूकारों में मैं हूॅं

मिले हुए अनुदानों में मैं हूॅं

कहे गए आख्यानों में मैं हूॅं

भूख और निवाले में मैं हूॅं

मैं ही चेतन, मैं ही अचेतन

मैं ही विध्वंस मैं ही तुम्हारा प्रारब्ध

मैं ही मैं हू! घबराते क्यूं हो ?


आओ मिल जाओ मुझ से

मैं ही माधव मैं ही केसव

मैं ही नर मैं ही नारायण

घबराते क्यूं हो...???

~ सिद्धार्थ



 


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