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सुगंधा की बकरी

सुगंधा कुछ बडबडाते हुए तेज - तेज कदमों से आंगन पार कर रही थी। उसके एक हाथ में छोटी सी बाल्टी दूसरे में बांस की छोटी सी टोकनी जिसमें रात की बची बासी रोटी और आटे का चोकर था। तभी दरवाजे से अंदर आते नीलेश ने पूछा "बूढ़ा तो गई ही हो अम्मा दिमाग भी खराब हो गया है क्या? यह ... काम करते करते तुमको बड़बडाराने की आदत कहां से पड़ गई ?" सुंगनधा को ऐसे जान पड़ा मानो किसी ने नंगी बिजली की तार से उसे छू दिया हो। उसने झल्लाहट और चिढ़ में अपनी चाल और वाणी दोनों को गति देते हुए कहा "हां तुम लोग सहर जाकर दू चार किताब पढ़ कर ज्यादा होशियार हो गए हो न ... हम क्या जाने होशियारी हम तो गवई गवार लोग तुम लोग ही सब समझते हो जाओ इहां से नहीं तो झगड़ा हो जाएगा .... नीलेश जो उसके पीछे पीछे चल रहा था आज पूरा का पूरा ठिठोली के मूड में था। गांव के सभी छोटे बड़े उसे पसंद करते थे, सुगंधा कुछ ज्यादा ही। निलेश जब भी शहर से गांव आता वह सर्वप्रथम सुगंधा से मिलने जाता ... सुगंधा के हाथों नाश्ता पानी करने के बाद ही वो अपने आंगन जाता और वहां लोगों से मिलता था। इस बार भी उसने ऐसा ही किया लेकिन आते ही देखा सुनंदा...

एक क्रांतिकारी ऐसा भी ( भगवती चरण वोहरा और दुर्गा भाभी )

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त उस समय गिरफ्तार हो चुके थे और लाहौर जेल में थे ।  बाहर जो क्रांतिकारी थे, वो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयासरत थे । उन्हीं में से एक थे भगवती चरण वोहरा जिन्हें 'बापू भाई' या 'बाबू भाई' भी कहा जाता था। कुछ क्रांतिकारी उन्हें भगत सिंह के परामर्शदाता भी कहते हुए दिखते हैं। वो दुर्गा भाभी के पति थे। इन दोनों का आजादी के संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान रहा है।  उन लोगों ने निर्णय किया कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को हम ससस्त्र छुड़ा लेंगे । बमों और पिस्तौलों से लैस होकर पुलिस दल पर हमला करेंगे और भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त को छुड़ा लेंगे । जिसके लिए बम बनाए गए। अभी बम का परीक्षण होना बाकी था की बम कितना अधिक घातक सिद्ध होगा इसको जांचने के लिए  यह घटना लाहौर के रावी नदी के किनारे की है। इसके लिए भगवती चरण वोरा , सुखदेवराज और विश्वनाथ वैशम्पायन को चुना गया। उस वक्त आजाद वहां मौजूद नहीं थे। ये तीनों लोग  28 मई 1930 के सुबह 10 / 11 बजे के करीब बम लेकर निकलते हैं रावी नदी की ओर जहाँ बिना ज्यादा मशक्क्त के उन्हें नाव भी मिल जाती है क्यूंकि सुखदेव रा...

कविताएँ

 बस तुम बेईमान हो  तुम्हें उन लोगों से ख़ब्त की बू आती है जो बात करते हैं आजादी की शिक्षा की रोजगार की तुमने कभी सोचा है कितनों ने इसी आजादी, समता, समानता की बात करने के लिए जवानी गला दी अपनी लोहे के जेबरों को अपने पहुँचे और पसलियों पे ढोते हुए लोहे के सलाखों के पीछे पिघलते हुए क्या तुम्हें पता है कितनों ने अपना बूंद बूंद रक्त बहा दिया तुम्हारी बाँझ होती नस्ल को सींचने के लिए तुम्हें तो सब पता है … बस तुम बेईमान हो बस तुम बेईमानों को याद रखना चाहते हो देवता बना कर पूजना चाहते हो तुम देवता हुए लोगों को उनका इतिहास रचने में मदद कर रहे हो ये भूल कर कि देवताओं के इतिहास में सिर्फ देवताओं का ही समुदाय होता है पूजकों का कोई जिक्र नहीं होता कभी नहीं ! कभी भी नहीं ~ सिद्धार्थ मेरा भगवान … राम मेरा भगवान … राम प्यास मैं तो … भागीरथी राम भूख मैं तो … रोटी राम नंगा मैं तो … लंगोटी राम बेघर मैं तो … घर राम शाखा मैं तो … जड़ राम मैं कुछ भी नहीं … सब कुछ राम अब कई दिनों से मैं भूखा हूं पानी की आस में सूखा हूं राम राम जपता हूं राम राम लिखता हुं फिर भी मैं भूखा हूं पेट की आग में कंठ तक झुलसा ह...

आज लिख देती हूॅॅं

शंख सख्त खोल के अंदर तुम भी उतने ही कोमल हो  जितना कि कोई फूल बस तुम्हें खुद को छुपाए रखना पड़ता है  दुनिया के आघातों से इसी क्रम में, तुम चूक जाते हो प्रेम से मगर कब तक छुपा पाओगे खुद को  अपनी कठोरता के नीचे किसी रोज कोई प्रेम में आसक्त होंठ  तुम्हारी कठोरता को चूम लेगा  और तुम बज उठोगे किसी के प्रेम का आलाप बनकर या फिर किसी क्रांति का उद्घोष बन कर  या कोई अपनी पूरी आस्था से  तुममें जल भरेगा और  छींट देगा पूरी मानवता पर कि जल जाए उनकी सारी अशुद्धि दो शुद्ध होठों के स्पर्श को  तुम रोक नहीं पाओगे शंख बनकर  ~ सिद्धार्थ 20-03-21 2) प्रतीक्षा शेष है मैं खर्च हो रही हूॅं मंदी में गुल्लक से निकले  रेजगारी की तरह तुम दूर जा रहे हो जेठ वैशाख के जलते चौपाल में  धरती के नाभि की ओर  खिसकते पानी की तरह बस प्रतीक्षा शेष है मंदी के जाने का  और सावन के आने का और मेरे अंदर तुम अहर्निश अशेष ~ सिद्धार्थ 3) प्राण तुम्हारी याद घर के सारे खिड़की दरवाजे  बंद करने के बावजूद  न जाने कहां से आ जाती है धूल और कोने कोने में  स्था...

क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक विकास (चापेकर बंधुओं से भगत सिंह तक)

 स्वाधीनता संग्राम में क्रांतिकारियों के प्रवेश की घोषणा करने वाला पहला धमाका 1897 में पुणा में चाफेकर बंधुओं ने किया था।  पूना शहर में उन दिनों प्लेग जोरों पर था। रैंड नाम के एक अंग्रेज को वहां प्लेग कमिश्नर बना कर भेजा गया। वह बड़ा ही जालिम और तानाशाह किस्म का आदमी था। उसने प्लेग से प्रभावित मकानों को बिना कोई अपवाद खाली कराए जाने का हुक्म जारी कर दिया। जहां तक उस हुक्म का सवाल है उसमें कोई गलत बात नहीं थी। लेकिन जिस तरह रैंड ने इस पर अमल करवाया उससे वह अलोकप्रिय हो गया। लोगों को उनके घरों से निकाला गया है और उन्हें कपड़े बर्तन आदि तक ले जाने का समय नहीं दिया गया। 4 मार्च 1897 को लोकमान्य तिलक ने अपने पत्र केसरी में एक लेख लिखकर ना सिर्फ नीचे के अफसरों पर बिल्कुल बल्कि खुद सरकार पर एक इल्जाम लगाया कि वह जानबूझकर जनता को उत्पीड़ित कर रही है । उन्होंने रेंट को निरंकुश बतलाया और सरकार पर दमन का सहारा लेने का आरोप लगाया। फिर आया शिवाजी समारोह इस अवसर पर 12 जून 1897 को एक सार्वजनिक सभा में अध्यक्ष पद से बोलते हुए तिलक ने कहा : 'क्या शिवाजी ने अफजल खान को मारकर कोई पाप किया था ? इ...

बाइस्कोप

 मेरे बचपन में जहां अन्य बच्चों को टीवी देखना, मेला घूमना, खेलना-कूदना पसंद था । वहीं मुझे  बाइस्को देखना पसंद था।  हफ्ते में शायद एक या 2 दिन ठीक से कुछ याद नहीं, पर ठीक दूपहरी में वो कंधे पर टीन का एक बक्सा लटकाए डमरु डूगडुगाते  हुए गांव के एक सरहद से प्रवेश कर गली गली में घूमते हुए दूसरी सरहद से निकल जाता था। जहां से भी वो गुजरता कुछ बच्चे एकजुट होकर देखने लग जाते और कुछ पैसे उसके हाथों पर रख अपने अपने घर चले जाते।  लेकिन मेरा कुछ अलग ही मामला था। मैं हर रोज दिन चढ़ने के साथ ही उसका इंतजार करने लगती। उस समय अधिकतर घरों में दीवार घड़ी नहीं हुआ करती थी। सो हमारे घर में भी नहीं ही थी और हाथ की घड़ी को देखना मुझे तो आता ही नहीं था। बड़े होने पर, बहुत मशक्कत से सीख पाई थी। लेकिन बालमन में बैठा हुआ डमरू का डूग डूग और बाइस्कोप का सपनों का संसार समय को समझने की कला में मुझे निपुण कर दिया था।  या ये कहना ज्यादा यथोचित होगा कि सभी बच्चे अपने किसी प्रिय खेल के समय को समझने में यूं ही निपुण हो जाते हैं । इसे मैं अब भी नहीं समझी जिसका भी अपना अलग ही कारण है। खैर ... ...

शब्द

 शब्द को पढ़ो शब्द को पढ़ते-पढ़ते  शब्द को सुनो शब्द में शब्द मत ढूंढो शब्द में खो जाओ तब तुम समझ पाओगे शब्द वो भी बोलना जानतें हैं जिसे तुम सुनने को तैयार नही जब शब्द तुम्हारी नाभि तक उतर आये और भूचाल मचा दे रक्त में   तब पूछना उससे ! उसका मर्म वो सुसुप्ता अवस्था में भी विस्फोटक होता है... क्यूँ कि शब्द में सब निहित होता है ... 1-9-2019 ~ सिद्धार्थ