मीरा बाई

 नस नस में बिजुरिया थीरक गई रे

 प्रेम इतना भरा मैं छलक गई रे


चढ़ती नदीयां कभी बस में होती नहीं 

जाग जाए प्रित तो कभी सोती नहीं

सौ भंवर लांघ के मेरे पग चल पड़े

भवें तन तन गई माथे पर बल पड़े

घोर संकट में है आज मर्यादाएं 

मेरे सर से चुनरिया सरक गई रे

प्रेम इतना भड़ा मैं छलक गई रे


नैन जुड़ते ही सिद्धांत टूटे मेरे 

हो गई मान अभिमान झूठे मेरे

लाओ मेरे लिए विष के प्याले भरो

प्रेम अपराध है तो क्षमा ना करो

छूट कर फिर करुंगी ये अपराध मैं 

खुल गए मेरे हाॅंथ मेरी झिझक गई रे

प्रेम में इतना भरा में छलक गई रे


प्रेम की आग में जल गई मैं जहां, 

रंग रंग के खिले बेल बूटे वहां

तन पर मेरे अब उन नैनो की छाप है 

कौन सोचे कि ये पुण्य है कि पाप है

राह सच की दिखाओ किसी और को

भटकना था मुझको भटक गई रे 

प्रेम इतना भरा मैं छलक गई रे


ये कहां धर्म ग्रंथों को एहसास है

गहरी पाताल से हृदय की प्यास है

ज्ञानियों में कहां ज्ञान ऐसा जगे

पीर वही जाने तीर जिसको लगे

डोल उठा जो थरथर जिया बाबरा

कांच के जैसे मैं तो दरक गई रे

प्रेम इतना भरा में छलक गई रे

~ मीरा बाई 

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