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Showing posts from October, 2021

एक क्रांतिकारी ऐसा भी ( भगवती चरण वोहरा और दुर्गा भाभी )

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त उस समय गिरफ्तार हो चुके थे और लाहौर जेल में थे ।  बाहर जो क्रांतिकारी थे, वो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयासरत थे । उन्हीं में से एक थे भगवती चरण वोहरा जिन्हें 'बापू भाई' या 'बाबू भाई' भी कहा जाता था। कुछ क्रांतिकारी उन्हें भगत सिंह के परामर्शदाता भी कहते हुए दिखते हैं। वो दुर्गा भाभी के पति थे। इन दोनों का आजादी के संग्राम में अपना महत्वपूर्ण योगदान रहा है।  उन लोगों ने निर्णय किया कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को हम ससस्त्र छुड़ा लेंगे । बमों और पिस्तौलों से लैस होकर पुलिस दल पर हमला करेंगे और भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त को छुड़ा लेंगे । जिसके लिए बम बनाए गए। अभी बम का परीक्षण होना बाकी था की बम कितना अधिक घातक सिद्ध होगा इसको जांचने के लिए  यह घटना लाहौर के रावी नदी के किनारे की है। इसके लिए भगवती चरण वोरा , सुखदेवराज और विश्वनाथ वैशम्पायन को चुना गया। उस वक्त आजाद वहां मौजूद नहीं थे। ये तीनों लोग  28 मई 1930 के सुबह 10 / 11 बजे के करीब बम लेकर निकलते हैं रावी नदी की ओर जहाँ बिना ज्यादा मशक्क्त के उन्हें नाव भी मिल जाती है क्यूंकि सुखदेव रा...

कविताएँ

 बस तुम बेईमान हो  तुम्हें उन लोगों से ख़ब्त की बू आती है जो बात करते हैं आजादी की शिक्षा की रोजगार की तुमने कभी सोचा है कितनों ने इसी आजादी, समता, समानता की बात करने के लिए जवानी गला दी अपनी लोहे के जेबरों को अपने पहुँचे और पसलियों पे ढोते हुए लोहे के सलाखों के पीछे पिघलते हुए क्या तुम्हें पता है कितनों ने अपना बूंद बूंद रक्त बहा दिया तुम्हारी बाँझ होती नस्ल को सींचने के लिए तुम्हें तो सब पता है … बस तुम बेईमान हो बस तुम बेईमानों को याद रखना चाहते हो देवता बना कर पूजना चाहते हो तुम देवता हुए लोगों को उनका इतिहास रचने में मदद कर रहे हो ये भूल कर कि देवताओं के इतिहास में सिर्फ देवताओं का ही समुदाय होता है पूजकों का कोई जिक्र नहीं होता कभी नहीं ! कभी भी नहीं ~ सिद्धार्थ मेरा भगवान … राम मेरा भगवान … राम प्यास मैं तो … भागीरथी राम भूख मैं तो … रोटी राम नंगा मैं तो … लंगोटी राम बेघर मैं तो … घर राम शाखा मैं तो … जड़ राम मैं कुछ भी नहीं … सब कुछ राम अब कई दिनों से मैं भूखा हूं पानी की आस में सूखा हूं राम राम जपता हूं राम राम लिखता हुं फिर भी मैं भूखा हूं पेट की आग में कंठ तक झुलसा ह...

आज लिख देती हूॅॅं

शंख सख्त खोल के अंदर तुम भी उतने ही कोमल हो  जितना कि कोई फूल बस तुम्हें खुद को छुपाए रखना पड़ता है  दुनिया के आघातों से इसी क्रम में, तुम चूक जाते हो प्रेम से मगर कब तक छुपा पाओगे खुद को  अपनी कठोरता के नीचे किसी रोज कोई प्रेम में आसक्त होंठ  तुम्हारी कठोरता को चूम लेगा  और तुम बज उठोगे किसी के प्रेम का आलाप बनकर या फिर किसी क्रांति का उद्घोष बन कर  या कोई अपनी पूरी आस्था से  तुममें जल भरेगा और  छींट देगा पूरी मानवता पर कि जल जाए उनकी सारी अशुद्धि दो शुद्ध होठों के स्पर्श को  तुम रोक नहीं पाओगे शंख बनकर  ~ सिद्धार्थ 20-03-21 2) प्रतीक्षा शेष है मैं खर्च हो रही हूॅं मंदी में गुल्लक से निकले  रेजगारी की तरह तुम दूर जा रहे हो जेठ वैशाख के जलते चौपाल में  धरती के नाभि की ओर  खिसकते पानी की तरह बस प्रतीक्षा शेष है मंदी के जाने का  और सावन के आने का और मेरे अंदर तुम अहर्निश अशेष ~ सिद्धार्थ 3) प्राण तुम्हारी याद घर के सारे खिड़की दरवाजे  बंद करने के बावजूद  न जाने कहां से आ जाती है धूल और कोने कोने में  स्था...