सोनी सोरी



सोनी सोरी इस नाम से जो भी लोग परिचित हों वो, इसे अवश्य पढ़ें…
वो लोग भी पढ़ें जिन्हें पुलिस हर हाल में शराफ़त के पुतले ही दिखते हैं। उनके हिसाब से पुलिस की कहीं कोई गलती होती ही नहीं।
और मैं आज कल पुलिस की शराफ़त को ही पढ़ रही हूँ।
सोनी सोरी छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में स्थित जबेली गाँव की एक आदिवासी विद्यालय शिक्षिका हैं और साथ ही सामाजिकी कार्यकर्ता भी।
सोनी सोरी ने 27 जुलाई 2012 को जेल से सुप्रीम कोर्ट के नाम भेजे गये पत्र में कहा है कि…
‘ आज जीवित हूं तो आपके आदेश की वजह से ! आपने सही समय पर आदेश देकर मेरा दोबारा इलाज कराया !… एम्स अस्पताल दिल्ली में इलाज के दौरान बहुत ही खुश थी कि मेरा इलाज इतने अच्छे से हो रहा है ! पर जज साहब, आज उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है ! मुझ पर शर्मनाक अत्याचार प्रतारणा की जा रही है ! आपसे निवेदन है , मुझ पर दया कीजियेगा ! .. जज साहब इस वख्त मानसिक रूप से अत्यधिक पीड़ित हूं ! (१) मुझे नंगा कर के ज़मीन पर बिठाया जाता है ! (२) भूख से पीड़ित किया जा रहा है (३) मेरे अंगों को छूकर तलाशी किया जाता है …..! जज साहब छतीसगढ़ सरकार , पुलिस प्रशासन मेरे कपडे कब तक उतरवाते रहेंगे ? मैं भी एक भारतीय आदिवासी महिला हूं ! मुझे में भी शर्म है, मुझे शर्म लगती है ! मैं अपनी लज्जा को बचा नहीं पा रही हूं ! शर्मनाक शब्द कह कर मेरी लज्जा पर आरोप लगाते हैं ! जज साहब मुझ पर अत्याचार, ज़ुल्म में आज भी कमी नहीं है !आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह किया जो ज़ुल्म पर ज़ुल्म कर रहे हैं !.. जज साहब मैंने आप तक अपनी सच्चाई को बयान किया तो क्या गलत किया आज जो इतनी बड़ी बड़ी मानसिक रूप से प्रतारणा दिया जा रहा है ? क्या अपने ऊपर हुए ज़ुल्म अत्याचार के खिलाफ लड़ना अपराध है ? क्या मुझे जीने का हक़ नहीं है ? क्या जिन बच्चों को मैंने जन्म दिया उन्हें प्यार देने का अधिकार नहीं है ?….
इस तरह के ज़ुल्म अत्याचार नक्सली समस्या उत्पन्न होने का स्रोत हैं …..
क्या इस में कोई दो राय है ? हरगिज नहीं । ये कहां और कानून के किस किताब में लिखा हैं कि किसी महिला बंदी जो साथ ही समाजिक कार्यकर्ता भी हो, उसे चाहे जिस भी किसी जुर्म में गिरफ़्तार किया गया हो, गिरफ़्तारी के बाद उसे करंट के झटके दिए जाए, उसे नंगा किया जाय, उसके साथ बलात यौन संबंध बनाये जाएं उसके योनि में पथ्थर ठूस दिया जाय।
मेरा ख्याल है इस तरह की अमानुषिकता की अनुमति कहीं नहीं है।
लेकिन ये होता है, और हमारे मुहों में ठूंस दिया जाता है देशभक्ति और पुलिसिया कार्यवाही की आड़ में अपनी घिनौनी मानसिकता को देश सेवा का नाम कह के।
तब ऐसे में मुझे ‘अशोक वाजपेयी’ की बात सच जान पड़ती है ‘हुआ ये है की हम सब पालतू हो गए हैं’ और ये सच है।
वर्णा पुलिस चाह ले की उसे किसी भी सरकार का पालतू नहीं होना तो सरकारें उस से अपनी ग़ैरवाजिब मांगे नहीं मनवा सकती।
और ‘सोनी’ से पुलिस चाह क्या रही थी ?
एक IAS अधिकारी सरकार के हाँथ का कठपुतली हो जाता है खुद को बेच देता है। और थाने को बना देता है बूचड़ खाना जहां एक औरत का आन और मान दोनों को जबह करता है।
सोनी को थाने में पीटते समय और बिजली के झटके देते समय एसपी ‘अंकित गर्ग’ सोनी से यही तो जिद कर रहा था कि सोनी एक झूठा कबूलनामा लिख कर दे दे जिसमे वो यह लिखे कि अरुंधती राय , स्वामी अग्निवेश , कविता श्रीवास्तव, नंदिनी सुंदर , हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और उसका वकील सब नक्सली हैं।
ताकि इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक झटके में जेल में डाला जा सके। सरकार के लिए ये समाजिक कार्यकर्ता परेशानी का सबब बन चुके थे। ये लोग छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ज़मीनों पर कंपनियों का कब्ज़ा नहीं होने दे रहे थे।
‘सोनी’ वो शिक्षिका है जो नक्सलियों से इस बात पे भीड़ जाती है कि स्कूल में काले झंडे क्यूँ लगाए ? उसे उतार फेंका और तिरंगा झंडा फहराया। उसी को इस राष्ट्र के राष्ट्र रक्षकों ने राक्षस बन कर चबाया।
अभी कुछ दिनों पहले ‘सोनी सोरी’ का एक इंटरव्यू देख रही थी उसमें उन्होंने ये कहा। सुन कर लगा शरीर का खून जम गया हो अंदर तक कुछ चीर गया हो। इतनी निर्दयता उन लोगों के द्वारा जिन्हें हमारा रक्षक होना था। हमारे साथ होने वाले अत्याचार पे उन्हें उठ खड़ा होना था। मगर …
“जैसे मुझे नंगा करके बिजली का शॉक दिया गया, बलात्कार किया गया, मेरे अंदर पत्थर डाले गए…मैं कितना रोई। मैंने तीन बच्चों को अपनी योनि से ही बाहर निकाला, लेकिन जब कोलकाता में मेरी योनि से पत्थर निकाले जा रहे थे तो मुझे जो दर्द हुआ वह बच्चा पैदा करने के दर्द से कई गुना ज्यादा था। मेरा क्या गुनाह था, सिवाए इसके कि मैं एक पढ़ी-लिखी आदिवासी महिला थी। मेरी जैसी अनगिनत आदिवासी औरतें इस यातना को आज भी झेल रही हैं। मैं यह सब दिखाना चाहती हूं, लिखना चाहती हूं, ताकि देश के लोग सोचें कि क्या हो रहा है। ” … जय हो
…सिद्धार्थ







***

तुम लिखोगे नहीं तो क्या हम दिखेंगे नहीं ?




वासुदेव बलवन्त फड़के ; वो नाम जिसे मिटाने के लिए अंग्रेजों ने एड़ी चोटी का जोड़ लगा दिया। जिन्हें साधने के लिए अफ्रीका के एडेन 'कला पानी' भेजा गाय और शहादत के बाद बीच समुद्र में फेंक दिया गया ताकि वो किसी के याद में जिन्दा न रह सकें। ताकि फिर कोई 'वासुदेव बलवन्त फड़के' कभी सर न उठा सके, लेकिन इस मिट्टी(देश) कि तो बात ही निराली है। जब-जब समय आया इस मिट्टी ने बेसकीमती सपूत दिए। 

वासुदेव बलवन्त फड़के ; महाराष्ट्र के रायगड ज़िले के 'शिरढोणे' नाम के गांव में, एक किसान के घर में एक बच्चा जन्म लेता है। जो बच्पन से ही स्वस्थ शरीर और स्वस्थ दिमाग का मालिक था जिसका नाम उसके परिजनों ने 'वासुदेव बलवन्त फड़के' रखा था । जिसे जंगलों और पहाड़ों में घूमना बेहद पसंद था। उनकी प्रारभिक शिक्षा 'कल्याण' और 'पुणे' में पूरी हुई।  'फड़के' के पिता की ईक्षा थी कि वो अपनी पढ़ाई छोड़ कर किसी व्यपारी के यहाँ दस रुपया मासिक पर नौकरी कर लें ताकि परिवार के निकट भी रह सके। परन्तु 'फड़के' को ये मंजूर नहीं था जिस के कारण वो मुंबई चले गए और वहां जी.आर.पी. में भर्ती हो गये  बीस रुपया मासिक बेतन पर और साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। इसी दरम्यान उनकी शादी भी हुई लेकिन ये कुछ सालों का साथ ही साबित हुआ। 28 वर्ष की उम्र में बिधुर हो जाने के कारण दूसरी शादी भी हुई। 

नौकरी के दौरान ही उन्हें एक दिन खबर मिली माँ अस्वस्थ हैं, सरकारी अफसरों ने छुट्टी मंजूर नहीं कि जिस के कारण वो बिना बताये ही गांव कि ओर चल पड़े। पर उन्हें अंदाजा ही नहीं था वहां जो दुखद खबर उनका इंतजार कर रही है वो उनके जीवन को ही बदलने वाली है। 

गांव पहुंच कर पता चला उन्हें आने में देर हो गई, माँ को जाने की जल्दी थी। 'फड़के' ने माँ का अंतिम संस्कार किया और साथ ही अंग्रेजी सरकार की नौकरी को भी तिलांजलि दे दी। उन्हें अब ये अच्छे से पता चल गया की गुलामी किसे कहते हैं। अपनी पढ़ाई के दिनों से ही उनके मन में 1857 के असफल क्रांति और अंग्रेजों  द्वारा समय समय पर बिद्रोह को दबाने में क्रांतिकारियों के हत्या से मन में रोष उतपन्न होता था अब वो इस पर ही सोचने और काम करने लगे। 

 अपनी नौकरी करने के दौरान ही उन्होंने जंगल में एक व्यायामशाला बनाई थी, जहाँ ज्योतिबा फुले भी उनके साथी थे। यहाँ लोगों को शस्त्र चलाने का भी अभ्यास कराया जाता था। लोकमान्य तिलक ने भी वहाँ कुछ दिनों तक शस्त्र चलाना सीखा था। 

अब यहां से ही नए युग का नए तरह के क्रांति का जन्म हुआ जिसे 'सशस्त्र क्रांति' की शुरुयात कह सकते हैं। उन्होंने खुद को छत्रपति शिवाजी का प्रधान सेनापति घोषित किया, और वहां के जितने भी छोटे-छोटे रियासत, छोटे-छोटे जमींदार थे और वनवासी आदिवसी सब को अपने मुहीम में शामिल किया और एक संगठन तैयार किया जिसका नाम रखा 'रामोशी' जो एक क्रन्तिकारी संगठन था। 'फड़के' पहले ऐसे क्रन्तिकारी थे जो सभी वर्गों को साथ लेकर आगे बढ़े और राम, महाराणा प्रताप और शिवाजी के युद्ध निति और सूत्र को लेकर आगे बढ़े। बहुत कम समय में ही महाराष्ट्र के सात जिलों पर उन्होंने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया जिस से अंग्रेजों को अपनी धुरी हिलती हुई जान पड़ी और वो बेचैन हो उठे इस प्रचंड बेग को रोकने के लिए। इसी सिलसिले में अंग्रेज अधिकारी बिश्राम बाग के एक सरकारी आवास में मंत्रणा कर रहे थे।  जिसकी सुचना 'फड़के' को लग गई ये 13 मई 1897 की बात है रात के 12 बजे अपने साथियों के साथ 'फड़के' ने सरकारी आवास पर अचानक हमला कर दिया जिसे देख अंग्रेज हक्का-बक्का रह गए। उन लोगों ने सभी अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया यही नहीं पुरे बंगलें को भी आग के हवाले कर दिया। जिस से गुस्साई अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकडने पर 50 हजार रूपये का इनाम घोषित कर दिया।  मगर उन्हें कहाँ पता था वो उन सब का बाप निकलेगा। अगली सुबह मुंबई वासी और अंग्रेजों ने जो देखा उसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। हर जगह 'फड़के' के हस्ताक्षर के साथ पर्चा था जीस पर लिखा था अंग्रेज अफसर रिचर्ड के सर को काट कर लाने वाले को 75 हजार रूपये का इनाम दिया जायेगा। इस घटना ने 'फड़के' को अचानक नायक के रूप में आवाम के दिलों में जगह दे दी। इस पर और गजब तो तब हो गया जब पुणे शहर को कुछ दिनों के लिए अपने कब्जे में ले लिया।  इसका अंग्रेजों के ऊपर भी प्रभाव पड़ा वो एकदम से बौखला गए और इसी बौखलाहट में उन्होंने 'मेजर डेनियल' को उनके पीछे साये की तरह लगा दिया। जिसके बाद 20 जुलाई 1879 को बीजा पूर से उनकी गिरफ़्तारी हुई। जिसके बाद उन पर मुकदमा चलाया गया जिस का कोई अर्थ तो था नहीं फिर भी दस्ताबेजों को पुख्ता करने भर के लिए कार्यवाही पूरी हुई और उन्हें 'अफ्रीका के एडेन' में कला पानी की सजा दी गई,31 अगस्त 1879 को आजीवन कारावास की सजा सुना दी गई। और वहाँ भेजा गया जहां से उनकी सांसे तो दूर यादें भी देश वापस नहीं आ सकती थी इसी का पूरा इंतजाम था। वहाँ जेल में भीषण यातनाओं के बीच शरीर कमजोर हो जाने के बावजूद भी एक रात सुरक्षा व्यवस्था कि चूक का फायदा उठा कर दीवार फांद कर भागने में सफल रहे। अपने शरीर के कमजोरी को भी धता बताते हुए वो 17 मिल तक भागते रहे। लेकिन अंत में पकड़ लिए गए। उनके इस दुःसाहस के इनाम के तौर पर उनकी यातनाओं में इजाफा हुआ और वो इतना था कि 17 फरबरी 1883 को उन्होंने देह त्याग दिया। और अंग्रेजो ने उनके पर्थिब को बीच समुद्र में लेजाकर इस लिए फेक दिया ताकि उनकी कोई निशानी न रहे। कोई ऐसी चीज न बचे जिसे अस्मारक बना कर लोग उन्हें याद करें और उनके जैसा होने का ख्याल भी मन में लाय। 

ऐसे थे 'आदि क्रांतिकारी' वासुदेव बलवन्त फड़के

***
सिद्धार्थ 
***


गले जनेऊ, मूछों पे हांथ
कमर में पिस्टल रहता था,
देश भक्ति ही जिसके नस-नस में 
लहू बन दौरा करता था,
वो आज़ाद हमारा था-वो आज़ाद हमारा है।

दुश्मन में वो बात कहां थी
कि ‘शेर’ को वो तनिक डरा जाता,
चंदशेखर के मूछों को-
हल्का सा भी झुका जाता।
माँ का सच्चा लाल था वो,
देश भक्ति का अनोखा मिसाल था वो,
यारों का अनोख़ा यार था वो,
मल्खम से भी जिसका नाता बहुत पुराना था,
दुश्मनों को जिसे धूल में ही मिलाना था,
वो आज़ाद हमारा था-वो आज़ाद हमारा है।

बिस्मिल-अशफाक से भी जिसका गहरा याराना था,
फांसी से जिसे भगत सिंह को भी बचा कर लाना था 
दुश्मन को पैरों में ला,अंबर में भी जिसे गुर्राना था,
आज़ादी का परचम देश के हर चप्पे में जिसे लहराना था,
वो आज़ाद हमारा था-वो आज़ाद हमारा है।

चंद्रशेखर कहो या कह दो 
'आज़ाद' फर्क क्या पर जाता है,
देश भक्तों में बस वो 
आज़ाद ही जाना जाता है।

याद करो उस बीर को जो
बरबस ही ये कह जाता था, 
आज़ाद हूँ मैं आज़ाद मरूंगा,
दुश्मन जिन्दा छूने नही पाएगा,
मृत देह ही मेरा अपने साथ वो ले जायेगा।
इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में हुआ 
वही जो पहले से ही वो बोला करता था,
एक आज़ाद कि खातिर पूरी सेना आई थी।

दुश्मन छूने न पाए जिंदा जिस्म को 
इसलिए कनपट्टी पर पिस्टल का घोड़ा दवाया था,
झुक कर आखरी बार माँ को सीस से लगया था।
शेर कहो या कह दो आज़ाद फर्क क्या पर जाता है,
मृत देह ने भी दुश्मन को कुछ मिनटों तक तो भरमाया था।
देशभक्ति का असली मतलब हमको सिखलाने वाला 
इंकलाब का परचम थामे – वो आज़ाद हमारा था,
वो आज़ाद हमारा था- वो आज़ाद हमारा है
वो कल भी हमारा था वो आज भी हमारा है। 





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