मेरी कलम !


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05.11.19
मैं सोचती हूँ !
शहर के हर दीवार पे तुम्हें उकेर दूँ
फिर सोचता हूँ...
तुम्हारी सोच को,
हर स्कूल के आंगन में बिखेर दूँ
मैं सोचता हूँ...
सोचने वाली हर सोच को
तुम्हारा 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' का
ध्रुवतार उधार दूँ
मैं सोचता हूँ...
मैं ये क्या सब और क्यूँ सोचता हूँ...
...सिद्धार्थ
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24 .10 .19
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24 .10 .19

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25 .10 .19
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25 .10 .19
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माटी के हांथों से
माटी के दिए बनाए हैं
ले लो सोने के दिलवाले
ख़ुशियाँ बेचने हम आये हैं,
रहे उजाला तुम्हारे घर आंगन में
सब को ख़ुशियों का उपहार मिले
मेरे घर में भी बाल गोपाल हैं,
उनके लब पर भी
दीपावली की मीठी मुस्कान खिले
अंधेरे आंगन में भी कुछ दीप जले
रहो सलामत तुम और तुम्हारे बच्चे
हम को तो बस कुछ अनुदान मिले
मेरे बच्चे खाये बतासा जलेबी
तुम्हारे बच्चों को रोगन बादाम मिले !
...सिद्धार्थ
26 .10 .19 

कोई बेच रहा है तुझको
कोई खरीद रहा है तुझको
अब तू ही बता दे मुझको
जो मोल ली और दी गई
भगवान कहूं मैं कैसे उसको...?
...सिद्धार्थ
26 .10 19
***


ये टिमटिमाती शोख रौशनी,
ये अंधेरे को चीरती हजारों
रंग - बिरंगी जुग्नुओं का कारवां
कितना दूर धकेल पाएगी अंधेरे को...
अपने ज़द को ही तो बस रौशन कर पाएंगी
कहां गरीबों के घर आंगन तक जा पाएंगी...
है बहुत घना अंधेरा, अंदर भी और बाहर भी
कुछ कतरा नही, रौशनी का सैलाब चाहिए
कुछ जिद्दी पूनम का महताब चाहिए
तभी तो अंधेरे अंगनों में भी रौशनी मुस्काएंगी
साहिबों के डेउड़ी से झोपड़ी के दलानों तक
बस स्वेत वसना रौशनी खिल खिलाएंगी ...
#सिद्धार्थ
28 .10 .19 
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जाति - धर्मों में बटा, आधा इंसान न मुझको चाहिए,
न मुझको काजी - मुल्ला, न पंडित - पुरोहित चाहिए,
भाता नहीं धर्मों में बटना, आता नहीं हिंदू मुसलमां करना,
हम तो बस इंसां हैं, आता है बस सौहाद्र का खेमा करना,
भेदभाव से रंज है मुझको, फर्क से दुश्मनी अगाध है,
और कुछ नही बस अपने पन से हमें प्यार निर्विवाद है,
इंसान बनना है अगर तो ही अपना हांथ आप उठाईए
आईए इस बार इंसान बन कर ही सब को दिखलाइए,
कोई काटे, कोई बांटे, इसमें भला क्या उल्लास है ?
घर की दहलीज़ों पर बस खून सनी लाश ही लाश है,
किसी भूखे को खाना खिला दो, इस में क्या ब्याघात है
किसी रोते बच्चे को हंसा दो तो, यही अनोखी बात है,
ये भी सच, तरुनाई और वृद्धापन संग साथ चल सकता नही,
तो, उजड़े उपवन को सजाने के लिए बहार ही न्योत कर लाईए,
है घृणा अंधी तो क्या ? भाईचारा पर ही इमान जगाइए,
जाति - धर्मों में बटा आधा इंसान हरगिज न मुझको चाहिए,
जाईए एक बार खुद को खुद में ही ढूंढ़ कर पहले आईए
आकर फिर नफरत पर प्यार का पहरा - गहरा लगाइए ।
... सिद्धार्थ
31.10.19 
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हमने चाहा नही, बापू से ऊंचा होना
हमने चाहा नही नेहरू को नीचा करना
इस ऊंच नीच के चककर में
गांधी नेहरू के टककर में
हमने चाहा नही गिर कर बड़ा होना
सबसे ऊंचा बन तन कर खड़ा होना
पर,चलो कोई नही...
मैंने उम्मीदें फिर भी खोई नही
आवाम चिर निंद्रा में अब तक सोई नही
तुम डाल दिए हो मुझको इसमें तो
कब तक हम उंचे रह पाएंगे
इस ऊंच नीच के चककर से
जल्दी ही हम उबर जायेंगे
जवाहर संग था अपना याराना
तुमको था उसमे भी द्वेष गिनवाना
तुम को हमने तो किया कभी भी मांफ नही,
बापू के तुम नृशंस हत्यारे थे
जो राम के बड़े दुलारे थे
राम स्वयं कंठ में उनके बसते थे
तुम उन से ही द्वेष रखते थे
अब तुम ही मुझे पूजे बैठे हो
देखो तो कैसे तन के ऐंठे हो...
हम राम दुआरे अर्जी लगाएंगे
गाँधी, नेहरू और वो सारे लोग
जिन्होंने देश पे जीवन उतसर्ग किया
हम सब ने अपने अपने सामर्थ भर दिया
राष्ट्रहित में, एक ही राह के पथिक जाने जायेंगे
...सिद्धार्थ
31.10.19 

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अख़बार बेच रहे हैं वो सस्ती में

सपने बिखरे हैं अपनी बस्ती में। 
बांकी सब अपने-अपने मस्ती में
फांका बस गरीबों की बस्ती में। 
किस को पड़ी है भूखे नंगों की
किस को पड़ी है बेबस बंदों की। 
सब खेल रहे हैं अपनी हस्ती में
जर-जमीन के खीचा कस्ती में।
चंद टुकड़े धरती के उन्हें जो पाने हैं 
कुछ सिक्कों को भी तो खनकाने है। 
अपनी जात की धौंस उन्हें दिखलाने है 
बेबस-मजलूमों को औंधे मुँह गिराने है। 
इस लिए इन्हें जरा और अभी इतराने है 
सबको ठोक-पीट के ठिकाने भी लगाने है। 
यही सोच मजलूमों को दवाया जाता है  
खुलेआम खून उनका बहाया जाता है। 
सर फोड़-फाड़ खेतों में दौराया जाता है
बंदूकों की गोली से जान निकाला जाता है। 
ये सब कुछ राम राज में ही होता है
राम मुँह फेर बस चुपके से सोता है। 
लाशें बिछी है खेतों में उनकी जो
जो गरीब आदिवासी कहलाते थे।  
आदि काल से जोत कोर कर  खाते थे
उससे ही अपना घर परिवार चलाते थे। 
अब हैं रोते बच्चे और बिधवाबिलाप
घर-घर में फैली है मातमी अभिषाप। 
जिसे देख बिधाता भी अब नहीं रोता है
दुख इनका अपनी छाती पे नहीं ढोता है। 
वर्दी वाले भी मस्त हैं अपनी ही गस्ती में
सरकार लगी है एक दूजे पे ताना कस्ती में। 
सब कुछ महंगा बिके इस देश की मंडी में
आदम की जान बिके बस सबसे सस्ती में। 
अंधी सरकार के हाथों से इंसाफ किया न जायेगा
इंसाफ के राह में जिगरी ही खड़ा नजर आएगा। 
इंसाफ की बातें तो लदी हैं कागज के किस्ती में
बांकी सब के सब बातें सरकार के धिंगा-मस्ती में !
...सिद्धार्थ

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औरत हूँ...
कभी आग तो कभी पानी हूँ,
कभी नीमगोली तो कभी गुड़धानी हूँ,
छू लिया जो किसी ने आन मेरी,
कभी लक्ष्मी बाई तो कभी रज़िया सुल्तना हूँ,
कभी तीर तो कभी कमान हूँ,
कभी ग़ुस्सा तो कभी प्यार हूँ।
प्यार रहूँ तो ठीक,
गुस्सा हुई तो ?
तो बीमार कैसे हूँ ?
तेरे लिए बेकार कैसे हूँ ?
खुद को पता नहीं तुझको,
बीमार मैं नहीं, तू है बीमार
मनुवादिता का अजब सा, है तू शिकार
सँभाल अपनी खुद की बीमारी को,
जतन कर कुछ, धर ले अपने खीसे में,
मूरख है, क्या तू ?
क्या जानता नहीं तू,तुझ में ही नहीं
तेरे बाप के भी नमक पानी में हूँ।
औरत हूँ कभी बिजली
कभी रेशमी एहसासों में हूँ ।
मेरा क्या मैं तो नार अलबेली
कभी मिश्री तो कभी करेले में हूँ ।
हाँ, मैं औरत ही हूँ,
कभी प्यार कभी गुस्से के
अजब मनमानी में हूँ !
...सिद्धार्थ


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1.
हम अपनी आद्तों से न जाने कब तक बाज आएंगे 

किसी की मर्जी हो के न हो हम आवाज़ उठाते जायेंगे। 

हम अकेले वो नहीं जो इस दहर में दफ़नाये जायेंगे 

चुप रहने वाले होठ भी तो किसी दिन पुकारे जायेंगे। 

भूखे खो खाना मिले और प्यासे की मिट जाय तृष्णा 

मजलूमों को मिले आसरा, बेटियों को इज्जत का दागिना। 

इंकलाबी सुबह आए सारे धरती अंबर पर छा जाए 

अपनी धुन में हम तो भईया बस ये गाना गाते जायेंगे 
...सिद्धार्थ 
दहर=काल, समय, दुनिया, जगत

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2.देखो कहीं गर बेटियों को तो... 
दिल को ज़रा बड़ा करना... 
उनके लिए दुआ करना... 
जिस घर में हो बेटी... 
रहे घर वो आबाद... 
देखो, किसी जाई की जाई को 
या होने वाली मई को 
देखो, तुम बर्बाद उन्हें न करना... 
संभालना खुद को और ... 
जरा उसे भी संभाल लेना... 
अपने देश का नाम दुनियाँ में... 
कुंठाओं से न तुम बदनाम  करना... 
माँओं से कभी घर होता नहीं बर्बाद
घर-घर को करती हैं आबाद 
बेटियाँ किसी एक की होती नहीं,..
होती हैं पुरे समाज की आधार...
पूरे समाज को दाग दार न करना... 
देखो किसी की बेटी को...  
तुम बर्बाद कभी मत करना... 
...सिद्धार्थ**

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3.कोई नहीं... 
आओ, साथ में मेरे 
ले चलूं तुझे मैं...
सच से रूबरु कराने...
बर्दास्त न कर पाओ तो 
छोड़ जाना साथ मेरा...
बढ़ कर धर लेना राह नया 
जो अगर सच से मिलना हो...
आईने में कुरुप सा दिखना हो 
चल परड़ना साथ मेरे 
जीवन में हैं व्यघात बड़े...
तुम से गर न हो पायेगा 
नदी सा ही मैं बढ़ जाउंगी 
तुम्हें फ्लांग दूर कहीं चली जाउंगी, 
तुम कंकड़ बन पड़े रहना, 
मैं समुन्द्र से मिल जाउंगी 
नया तूफान लाऊंगी, 
तुम्हें भी बहा ले जाऊँगी, 
सब समतल कर जाऊँगी 
...सिद्धार्थ**


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4.विद्रोही अभी ज़िंदा हैं !
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विद्रोही मरे नहीं,
विद्रोही मरा नहीं करते
वो ज़िंदा हैं,
जब तक शोषण ज़िंदा है
जब तक शोषण के खिलाफ
उठने बाली आवाज ज़िंदा है 
जब तक हमारे कंठो में 
प्रतिकार ज़िंदा हैं,
जब तक हमारे शब्दों में 
आग ज़िंदा है 
जब तक हम ज़िंदा हैं,
और 'हम 'हम अभी ज़िंदा हैं
तो तय है,
विद्रोही अभी ज़िंदा हैं !
...सिद्धार्थ
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5.उठो द्रोपदी 
अब समर को सजना ही होगा 
अपने अपमान के लिए 
फिर नया महाभारत रचना ही होगा 
सीता नहीं, मीरा नहीं,राधा नहीं 
अब काली का ही रूप धरना होगा 
सुनों द्रोपदी अब तुम्हें 
खड़ग हाँथ में धरना ही होगा 
वो जो थे तुम्हारे खेवनहार 
उनकी नैया लगी है संसद पार 
अब उठ कर तुम को 
खुद रण में उतरना होगा
उठो द्रोपदी, सुनों द्रोपदी 
अब गूंगे बहरों से 
प्रतिशोध लिया न जायेगा 
उनके घर आंगन में तुम्हें 
बेटियों की छाया भी न मिलने पायेगा 
वो निरबंसी बेटीयों का दुख सुनने न पायेगा 
फिर भी वो बेटियों का रक्षक 
सदा ही वो कहलायेगा 
उठो द्रोपदी, 
अब काली होके तुम्हें 
महाकाल बनना ही होगा 
इस विषम परिस्थिति से खुद निकलना होगा 
......सिद्धार्थ ...
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6.हर रोज करीब 46 बच्चे रेप के शिकार ..!

N.C.R.B REPORT(2016)

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जहाँ से चले थे कभी हम, अब वहीं आ गए

देखिये तो हम कहाँ थे और कहाँ आ गए। 


जनावर से इंसान हुए थे अभी-अभी तो

फिर जानवर सा ही निकल के आ गए।


बड़े नाज़ से अंदर छुपाया था हमने, वो

फुदक के गौरइया सा चारों दिशा में छा गए।


महफूज रखेगा कौन, भगत के एहले वतन को

हम सड़कों से निकल कर संसद तक आ गए। 


हमें चाव है सुंदर सुडौल टांग की 

उस में भी जननी के जननांग की। 


फूलों सी कोमल बदन के बाज़ार की 

अपने ही तन के सांकेतिक आधार की। 


जिससे निकल आये थे दुनियाँ के बाज़ार में 

अब नोचना-खसोटना है उनको सरे बाज़ार में। 


हो वो कली, चाहे पूजा की ही फूल हो 

हमारे हवश के लिए तो बस धूल-धूल है । 


वो कहते थे चिल्ला के, बंदी बनायेंगे हमको 

ऊपर से छै इंच छोटा अरे कराएंगे हमको। 


अब हम उनके ही सरपरस्ती में आ गए 

कारनामें हमारे सब उन्हें जरा भा गए। 


पहले हम रहते थे डर कर, थे हम अंधेरे के साथी 

अब खुली रौशनी में देखो, हम हुमक कर आ गए। 


कहाँ से चले थे, कहाँ आ गए चारों दिशा में हमी छा गए 

अब रोकेगा कौन हमें, संसद तक चुन के हमी छा गए !

...सिद्धार्थ...


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7.

तम्हें धर्म कहूँ 
या जीने का सलीका 
या तुम्हें मौत कहूँ,
कुछ भी हो,
तुम्हें समझना मुश्किल नहीं 
बस एक खाली दिल,और 
एक खाली दिमाग चाहिए 
बुद्ध के भिक्छा पात्र जैसा 
तभी तो जाना जा सकता है तुम्हें 
तुम सब कि पीठ पे हो, 
जैसे कछुए कि पीठ पे पृथ्वी हो 
और कहीं भी नहीं। 
ढूंढने पे तुम मिलते नहीं, 
मिल जाओ, तो दिखते नहीं 
पर सब अपने-अपने तरीके से देखते है तुम्हें 
किसी को मंदिरो के चौखटों में दीखते हो 
किसी के लिए सोने चांदी में खनकते हो,
किसी को कुर्सी के पाए में 
किसी को बंदूकों के साए में 
पता नहीं,
कहाँ किस-किस रूप में मिलते हो। 
मुझे तो कुरूप से दीखते हो,
खेतों के दरारों में, बेबस बीमारों में 
माँ के आहों में, बच्चों के कराहों में 
किसानों की लाशों में, 
नोजवानों के टूटे आशाओं में
बेटियों के नुचे हुए मांसों में 
कहाँ देखूं कि दिखो तुम 
ख़ुशियों के मीनारों में,
हंसी के बयारों में 
दिये के लश्कारों में 
तुम मुझे कहीं नहीं दीखते 
प्यार के फुहारो में। 
...सिद्धार्थ ...
***8 
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कई बार सोचती हूँ 
तुम्हें पलट कर कह दूँ 
कि कोई नही रहता वहां 
क्यूँ तकते हो उसे...? 
क्या है गिला... ?
जिसे कहते हो तुम उस से 
आओ तुम्हारे सारे प्रश्न मैं सुनू 
सारे दुख अपनी पलकों से चुनू 
पर शब्द उलझ जाते हैं होठों पे, 
कह नही पाती, 
कि जीवन जीवन में ही उलझा होता है 
शून्य ही तो विराट का उल्टा होता है 
कभी-कभी लगता है कह दूँ
आस -निरास में तैरना ही तो जीवन है 
और ढलान से उतरना,
 चुपचाप बह जाना ...
...सिद्धार्थ





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