चोट


एक मुनिया

एक मुनिया अलसाई सी
बैठी है खुद को सिकुड़ाई सी
पूछ रही है पास में बैठे बाबा से 
हम दुनियां में क्यूं लाए गए हैं
क्या छल से हम बुलाए गए हैं
विधना (भगवान) के थे गर चार चार बच्चे
सब ही रहे होंगे मन के सच्चे
फिर अलगुआ (बटवारा) में
जूठन ही क्यूॅं आये हमारे हीस्से 
क्या विधना के मन के भी थे दो चार हीस्से
एक को मिला पोथी पुराण
दूजे को बरछी कमान
तीजे ने भंडार चुना
हम को क्यूं पैरों का छारण
सब के हिस्से का मैला उठावन
क्या विधना भी छली था
पड़ोस के काका जैसा ही मतलबी था
लोग तो कहते हैं कि वो दाता था जो महाबली था
फिर क्यूं साया हमको बदन दिया उनको
सुबकती रातें हमको दिन का उजाला उनको
बोलो बाबा ... क्या विधना छली था ?
बाबा .... 
राम जाने चिरैया 
पहले बीधना आए
या थे पहले मनूख जीवन के धुनि रमाए
पाहन पहाड़ पूजी थी पहले
या पाथर से थे पहले आग जलाए
अन्न जल को पूजा पहले
या थे पहले भूख मिटाए
पहले काटी थी बांस घास 
या मन में एक दूजे के लिए थे डाह उगाए
पर, मनुख ही तो है जो 
मन में है दो दो क्यारी बनाए
एक में पाले प्रेम 
तो दूजे में बैर का नागफणी उगाए
एक में रखे दया करूणा तो दूजे में
सकल संहार संवारे
एही खातिर तो बृद्ध जन बोल गए हैं
कर में माला नहीं कलम को फेरों 
धरम नहीं करम को बेरो

हम भूखे है


तुम डकार सकते हो क्यूं कि 

तुम ने हमारे हिस्से के अन्न से

ठूसा है पेट से लेकर कंठ तक

और हम भूखे है

इस लिए 

हम सिर्फ चिंघाड़ सकते हैं, अनंत तक

हमारे चिंघाड़ने से हिल जाएंगी
तुम्हारे आलीशान महलों की नीबें
जिसमें दफ़न है हमारी भूख और 
छोटे छोटे सपनों की उधड़ी लाशें 
हमारी माॅं बहनों की 
उघड़ी हुई इज्ज़त की घुटती सांसें
कमजोरियां हमारी अपनी थी
हमीं ने तुुुुम्हारे पीछे चलने को 
अपनी मौन सहमति दी थी
हमीं ने तुम्हारे देवत्व को बनाए रखने की तमाम प्रयासें की थी
युद्ध को हर बार तुम्हीं ने चुना
अपने फायदे के लिए
सत्ता और साम्राज्य विस्तार के लिए
झोंकते रहे हमें संहार के दावानल में 

युद्ध दर युद्ध 

सीमा और सुरक्षा के नाम पर
मरते रहे हम बेगुनाह 

तुम्हारा कहा मान कर
हमीं ने तो चुना था सिपाही होना 
नस्ल के सुरक्षा के नाम पर 
तुम्हें मजबूत और मजबूत
और विशाल प्रजापति बनाए रखने के नाम पर
खेतते रहे हमीं पीढ़ी दर पीढ़ी
बनते रहे तुम्हारे उन्वान की सीढ़ी
एक विद्रोही सुसुप्ता अवस्था में
सदैव पलता रहा 

हमारे भीतर के काल कोठरी में
मांगा जिसने सदैव अपने हिस्से के जायज़ हक को
झिड़कियों में सुलाया जिसे तुमने
अबोध शिशु मान कर
मगर अब नहीं ... 
अब बहुत हो चुका 
हम जगाएंगे अपने अंदर के विद्रोही को
हमारे तुम्हारे बीच के इस फर्क को मिटना होगा
हमें गर भूख पहने, चीथड़ा ओढ़े रहना है ...
तो तुम्हें भी इसी हाल रहना होगा 
वर्ना तो 

हमको भी हक हमारा देना होगा
हमें समता समानता के बात पर अब 

लड़ना ही होगा

~ सिद्धार्थ

किसान हूँ 


किसान हूँ मैं, ख़ुशी से सब के भूख को ढोता हूँ
सब के हिस्से का दुख, खुद में ही समोता हूँ।

कौन है जो मेरे दुख को अपनी आंखो से रोता है
मेरे आँसुओं से खुद का दामन अपना भिगोता है।

धरती का सीना चीर रक्त का स्वेद बहाता हूँ

अपनी मेहनत से धरती को हराभरा बनाता हूँ

खुद भूखा रह के भी अन्न मैं उपजाता हूँ
घर-घर  के थाली तक अन्न को पहुँचता हूँ।


घर में मेरे बच्चे तन पे चिथड़े लपेटे ही होता है 
हर रात आधी पेट खाकर ही,टूटी खाट पे वो सोता है 

बड़ी निराली किस्मत अपनी, निराला अपना जीवन है 
जो भूखों का पेट भरे, वो खुद ही भूखा रह जाता है।   

किस्मत की तो बात ही छोड़ो, शासक के कानों तक भी
आवाज़ हमारी रेंग-रेंग कर भी, कभी न पहुंचने  पाता है।

बस चुनावी मौसम में याद हमारी सब को जाती है
फिर हमारे खेतों में भी परियाँ गेहूं काटने को आती है।

सब के मन को चार दिनों के लिए भरमा कर वो जाती हैं

सब हैं अपनी मस्ती में, फांका बस अपनी बस्ती में
खेतों के मेड़ों पे बिखरी जिंदगी बिके अपनी सस्ती में।

प्रकृति भी बड़ी अपघाती है, नित नए प्रपंच वो रचाती है
हर बार हमें ही अपने प्रकोप से कोप-भाजन करजाती है।

कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, मेहनत पे हमारे हंस कर पानी फेर जाती है
जो इस से भी जी भरे उसका तो खड़ी फसल को इक चिंगारी दावानल बनाती है।

किसान हूँ भईया, ख़ुशी से ही सब के भूख को मैं ढोता हूँ
प्रकृति और शाासक के हाॅंथों अपने सपने को खोता हूँ।


दुख करो मेरी बातों का, मुझ से रार मोल लो
मैं ही जो नहीं हुआ तो क्या तुम सोना चाँदी को ही खाओगे।


मेरे बच्चों को छोड़ो तुम , अपने बच्चों को कया खिलाओगे
रुपया ओढ़ाओगे क्या तुम तन पे ?

क्या रुपया को ही तुम खिलाओगे ?

किसान हूँ भईया, अपने साथ औरों के भी पेट की आग बुझाता हूँ
बस अपनी क़िस्मत और सरकार की लालच से जीत कभी नही  पाता हूँ  ! 

~ सिद्धार्थ

********

2. कृषक 



बच्चों का पेट काट कर, जो बीज मही में बोता है

कृषि प्रधान देश का, कृषक वो कहलाता है। 


दुनियाँ का भूख मिटाने को, जो दिन रात परिश्रम करता है

सपने में भी जो लहलहाते, खेतों को ही देखा करता है। 


कृषक है वो जो माटी में निस-दिन खेला करता है

उस कृषक के लिये, मही ही उसकी माता है। 


घाम जिसको जला न सके, तमी जिसे डरा न सके

इन्द्र की माया जाल जिसे, अपने पथ से डिगा न पता है .


सोने और चाँदी की चमक, पथभ्रष्ट न करने पाता है

उस कृषक के लिये, मही ही उस की माता है। 


खुद को भूखा रख के जो औरों का भूख मिटाता है

जिसकी आद्र रुदन को परमेश्वर भी सुन न पाता है। 


बियाबान उसका जीवन, कर्म फल मिल नहीं पता है

वर्तमान जल रहा, भविष्य भी अंधियारों में ही रह जाता है। 


सियासत और तरक्की जिसको बेबस और लाचार बनाता है

अपने हक की बात भी, जो खुलके जुवां से कह नहीं पाता है .


गिरबी रख के अपनी माँ [खेत] को कर्ज जो सर पे लेता है

चुका नहीं पाये तो, बेबस हो फाँसी को गले लगता है

गाय और माय के चककर में जो पिस के घुन सा रह जाता है 

उसी किसान को खेत में एक दिन सांड पटक-पटक के मार जाता है   .



वही दीन कृषि प्रधान देश का कृषक हमेशा कहलाता है

उस कृषक के लिए मही ही उस की माता है !



*******

3. कैसा शरद और कैसा पूर्णिमा


आसमान के आचंल में

दूधिया सा चाँद

शरद पूर्णिमा का

पूरी रवानी पे है ,

 अमावस्या को पछाड़ आया

पीछे कहीं ,

भूतकाल के अंधेरे में

विजय पताका लहराता हुआ

नीले आसमान में विचर रहा है

 वहीं नीचे

कुछ कुत्ते भौंक रहें हैं

कुछ रो रहें हैं,

और मैं

कभी चाँद कोकभी कुत्ते को देख रही हूँ 

 और सोचती हूँ...

क्या इस जानवर को

वो पता है जिसे मैं नही जानती ?

क्या वो चाँद से कुछ पूछ रहा है ?

 जैसे की ,

 कैसे तुहें लज्जा नही आती

कैसे इठला सकते हो ,जब

लाखों बच्चे भूखे पेट सोने को मजबूर हों

या

तब जब लाखों हाँथ फैले हों 

दरिद्रता की लाठी थामे

मंदिरो और मस्जिदों के आगे

फिर, कैसा शरद और कैसा पूर्णिमा

 तुम तो सब के आंगन घूमते हो ?

एक समान

वहाँ भीजहाँ से छिना जाता है

इन मजलूमों के हिसेसे का अन्न

और वहाँ भी,

जहाँ ये लोग, तुम्हें देख

अपने भूखे बच्चों को तुम्हारी लोरी गा सुलाते हैं

और कोई शिकायत नहीं करते तुम से

जाओ, तुम भी कहाँ पुरे हो

इतराओ मत ,

ये अँधेरा फिर घेरेगा तुम्हें 

थोड़ा -थोड़ा करके

फिर निगल लेगा तुम्हें 

फिर तुम्हारी और इनकी

लड़ाई एक जैसी होगी

अपनेअपने हिस्से की

अंधेरे से निकलने की .

तुम तो जीतते ही हो

हर पखवाड़ा पे, 

अब इनकी बारी है , 

नई रौशनी को घीच के अपने आंगन तक लाने की।

***

हम मर चुके हैं

हम मर चुके हैं
हम उतने ही मरे हैं
जितना पांडव
स्वर्ग जाते समय मरे थे
जब उनका मानव देह
गल- गल कर गिर रहा था
हमारा भी अंग प्रत्यंग
सड़ रहा है, वो गल रहा है
प्रेम गिरा था सबसे पहले
वो सबसे ज़्यादा नाजुक था,
दया,करुणा, सद्भावना
सब शनैः-शनैः छिटक रहा है
भाईचारा-सौहाद्र भी गिर गया

 मुँह
ताकते रह गए हम बस

हम अपने को आंकते रह गए
समर्पण - सेवाभाव भी छिटकी ही समझो
धर्म के जुए का कन्धों पे हमारे भार था
धर्म बचाना सबसे बड़ा कारोबार था
नफे नुकसान का अंदाजा लगाना ही बेकार था
हम पांडवों से जरा हट के हैं
सब को कफ़न ओढ़ाते चलते फिरते हैं
हम धर्म का तलवार लिए चल रहे हैं
हम धीरे धीरे मौत में बदल रहे हैं
अब भी जो कुछ बचा है हम में
जो बचा है जतन कर रहे हैं
बचा रहे, 
दरिंदगी,वहशीपने को
बड़े जतन से संभाला है हम ने

वही हमारा अशली भीत है
आज का वही तो सच्चा मनमीत है
मानवता जो टूट के बिखरी है,
सिसकती, सुबकती, छाती पीटती
आँखों से खून की आंसू रोती 
हाँथ बांधे पीछे-पीछे घिसट रही है वो
जाने कैसे थोड़ी थोड़ी सिमट रही है वो
वही तो धर्मराज है
जो धर्म को अब तक ढोई है
अब जाने वो क्यूँ आंखें मल-मल रोई है


आओ कहां तलक चलोगे साथ
थक जाओगे,सह नही पाओगे
समझो मुझको अपना खास
आओ मेरे जरा और पास
कफ़न ओढ़ाके के यहीं दफ़ना दूँ
तुम को मैं आज के आज…

~ सिद्धार्थ

आग लगे मेरे जी को
भूख से जी अकुलाता है
नमक – भात के बात पे
जनावर मुझ को बनता है।

आग लगे मेरे जी को
मुझे कुछ अब न सुहाता है
बेद कुरान की बातों से
दिल मेरा खूब झल्लाता है

आग लगे मेरे जी को
भजन अजान भी जुमला लगता है
राम रहीम कहां मुझ को
दो कोर भात खिला कर जाता है

आग लगे मेरे जी को
रजिया राधा में मुझको
अपना आप नज़र आता है
दिल का दर्द बहे कहीं भी
आंख मेरी नम कर जाता है

आग लगे मेरे जी को
पनघट मरघट सा दिखता है
कब्रिस्तान समसान में ही अब
अपना घर मुझ को दिखता है

आग लगे मेरे जी को
सच का मुंह दिखे बेढंगा है
चांद उतरे जो नील गगन से
मेरे आंगन वो भी बदरंगा है

आग लगे मेरे जी को
राम और रावण दिखे एक जैसा
एक ने छल से नार हरी
एक के छल से नार जंगल बिच आन खड़ी
एक

~ सिद्धार्थ

मैं समझती हूं कि
मैं कुछ नहीं समझती
मैं ये भी नहीं समझती
कि मैं क्या नहीं समझती
मैं दिए के नीचे दुबके अंधेरे को देखती तो हूं
मगर तेल और बाती के समन्वय से जन्मी
रौशनी से उसकी दुश्मनी को नहीं समझती
अपने बगीचे में खिले गुलाब के
रंग और खुशबू को देखती तो हूँ 
अपने सांसों में महसुस्ती तो हूँ 
पर गुल को कूट पीस के
गुलकंद क्यूं बनाया गया
धरा से आई थी धरा में ही खाद बन
मिल जाने क्यूं नहीं दिया गया
मैं ये भी नहीं समझती
अपने आस पास के दुनियां में
आधी आबादी को मचलते इठलाते
घर से बाहर तक मेहनत के झंडे गारते
देखती तो हूं, 
खुश हो मुंह उनका तकती तो हूं
मगर उनके छाती के उभारों और
जांघों के बीच के ढेढ़ इंच के हिस्से में
उनकी तमाम पहचान के गर्त होने को
मैं कतई नहीं समझती
मैं कुछ भी नहीं समझती
~ सिद्धार्थ


                                                          ⇝ सिद्धार्थ ⇜





Comments

Rahul said…
Amazing Collection of Poem

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