विद्रोही अभी ज़िंदा हैं !
.1)
विद्रोही अभी ज़िंदा हैं !
विद्रोही मरे नहीं,
विद्रोही मरा नहीं करते
वो ज़िंदा हैं !
जब तक शोषण ज़िंदा है
जब तक शोषण के खिलाफ
उठने बाली आवाज ज़िंदा
जब तक हमारे कंठो में
प्रतिकार ज़िंदा हैं
जब तक हमारे शब्दों में
आग ज़िंदा है
जब तक हम ज़िंदा हैं
और 'हम '
हम अभी ज़िंदा हैं
तो तय है,
विद्रोही अभी ज़िंदा हैं !
2)
हम लड़ेंगे ज़रुर
अंगीठी मे सिकते हुए आलू से
उठते हुए सोंधी सी गन्ध को
अपने नथूने से होते हुए
भीतर कहीं महसूस करना
अच्छा लगता है न ?
ठीक वैसे ही !
जाड़े के दिनों में
अंगीठी जला के बैठना
या गुनगुने धुप में खुद को सेकना
अच्छा लगता है न ?
लेकिन सरकार जिस अंगीठी पे
हमें बैठा के मजे ले रही है न!
उसे धर्म की अंगीठी कहती हूँ मैं
जिस में सिकते हम हैं ! और
मजा सेकने बाले को मिलता है
हमारे दोनों कूल्हे सिक के बेकार
और वो अपनी सारी इन्द्रियों को
मज़ा लेने में लगाए हुए हैं
जो हमारे लिए अँगीठियाँ जलाते हैं
उनके शब्दों में आग
और हाँथ में बारूद होता है
जिस से वो धर्म की अंगीठी जलाते हैं
और हम सिकते जाते हैं तब तक
जब तक हमरा जब्र जबाब न दे दे
अब हम मुहाने पे हैं
हमारा जब्र जबाब दे चूका है
अब हमें लड़ना ही होगा
अपने-अपने हिस्से के हथियारों से
तुम मेरे साथी (देशवासी) और कुछ नहीं तो अंगूठे से लड़ना
मैं भी, अपने हिस्से की कलम से लड़ूंगी
पर हम लड़ेंगे जरूर
अपने जख्मों के लिए
अपने अपने कुल्हों के लिए
!
***
3 )
समानता की राह में
एकता की बाँह में
देखो तो गौर से,
बिछ गए हैं काटों का जाल
नागों ने कर लिया है
मिल जुल कर मंत्रणा
फूलों और कलियों के
खुशबू और रंगों को
मिल के करेंगे हम गँदला
हम इतने घायल हैं
दर्दों से पागल हैं
जख्मों पे पीट रहें हैं काल !
सपने सब झर रहे हैं
नयनों के कोर से
बांधेगा कौन इस को
उम्मीदों कि डोर से
देखो तो शब्द मेरे
बुन रहा है कैसा
उम्मीदों का जाल
आँसू कि गोद में
पल रहा प्रतिकार है
शब्दों की बेनी पे क्रांति सबार है
आशा है आएगा इंकलाब का काल !
मौन जो बैठे हैं
धर्म पे जो ऐंठे है
पेट की आग बढ़ी तो
काटेंगे वही सब मिल कर
राक्षसी पूंजीवाद का जाल
4)
क्या कहा... हमें बचना है ?
खतरे से दूर हमें रहना है ?
बताया तो नहीं किस खतरे से ?
भूख, लाचारी या... बीमारी
कहां जाएं जो हम बच जाएंगे
जीवन ज्योति बचा लाएंगे
न कहीं घर है अपना
न कहीं कोई भीत खड़ी
ना खाने को है कहीं अन्न पड़ी
सुबह काम पे जाते हैं
तभी रात को हम खा पाते हैं
वस्त्र भी आधे आधे हैं
हम तो मन को भी अपने साधे है
ये जो हम निर्धनों की बस्ती है
इस में जीवन सबसे सस्ती है
भूख यहां बीमारी है
मौत हमारी लाचारी है
क्या कहा... लाचारी से बचो
कुछ दिन घर की अलमारी में रहो
फिर तो ! दाना पानी दे दो तुम
हमको भी जिंदा रख लो तुम
कुत्ते तुम्हारे हम से अच्छे हैं
चीज बटर वो चखते हैं
नापसंदगी के अपने अधिकार के साथ
घर में तुम्हारे शान से वो पलते हैं
हम तुम्हारे कुत्तों से भी गए बीते हैं
रुखी सूखी खा कर ही हम जीते हैं
क्या कहा ... सब चंगा है
अरे नादां आदम यहां नंगा
संसद के अहाते से जो नदी निकले
उस नदी का पानी भी गंदा है
~ सिद्धार्थ
5)
युवा देश का युवा हूॅं
बेज़ार हूॅं - बेकार हूॅं
और ! बेरोजगार हूँ साहिब
कंठ तक कर्ज में डूबा
निराशा में गिरफ्तार हूॅं
मेहनतकश हाथों के लिए
औजार का तलबगार हूँ
बेरोजगार हूँ साहिब
चुनें हुए सरकार से
एक अदद रोजगार मांगता हूँ
डिग्रीयों को लिए हाँथ में
मारा मारा फिरता हूँ
जेब में अठन्नी चवन्नी नहीं
आवेदन को धरता हूँ
इस मुफलिसी के दौर से
सच अब ! किनारा मांगता हूँ
बेरोजगार युवा हूँ साहिब
एक अदद रोजगार मांगता हूँ!
सत्ता और शासन का लोभ
ऑंखों में रखते नहीं है हम
माँ बाप के सूनी आँखों के
बस सूनेपन से डरता हूॅं
पड़ोस की बुआ - काकी
बिरजू भईया और बाकी के
नित नए तानों से निजात मांगता हूँ
बेरोजगारी के अंधे श्राप से
सच ! अब निस्तार मांगता हूँ
राष्ट्र धर्म के नाम पर
पेट धर्म अब खतरे में हैं
तिलक टोप के लफड़े में
रोटी लंगोटी खतरे में है
काबिलियत हमारे हाथों में है
नाम में लगे सरनेम में नहीं
मौक़ापरस्त लोग लगे हैं
पहचान हमारी बदल में हैं
उन धूर्त कपटी मक्कारों से
आने वाली नस्ल बचाना चाहता हूँ
काबिल हूॅं तो अपनी काबिलियत दिखाने का गुंजाइश मांगता हूँ
थक गया हूँ घिस - पिस कर
नौकरशाही और लालफीताशाही
के दो पाटों की चक्की में
और कुछ नहीं अब बस
इतिहास बदलना चाहता हूँ
सरकारें किस लिए चुनी जाती है
संसद को बताना चाहता हूं
एक नई सोच और विचार वाली सरकार लाना चाहता हूँ ,
बेरोजगार हूँ साहिब, एक अदद रोजगार मांगता हूँ।
~ सिद्धार्थ
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