दिलबरी

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मैं देर तक रुकती 

मगर अब देर हो गई

~ सिद्धार्थ

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हम न कहते थे दिलजले हो तुम आवारा नहीं

तुम पे तुम ही तोहमत लगाओ ये हमें गवारा नहीं

~ सिद्धार्थ

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वक़्त लगता है मेरी जाॅं इस जहां से जाते जाते

वक़्त होता तो तेरी पेशानी पे हम इक बोसा लुटाते जाते

~ सिद्धार्थ

*†*

सारे के सारे शब्द रीत गए

मौसम जितने भी सुहाने थे, वो ... बीत गए 

~ सिद्धार्थ

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इस इश्क के हाथों हाय इक दिन हम मारे जाएंगे

दिल के गांव में अपने हाय हम जिंदा दफ़नाए जाएंगे

~ सिद्धार्थ

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मेरा रंग नूर उतर रहा, मेरे बदन ए फलक पे शाम ढल रही 

तू जरा और देर ठहर के देख, साॅंझ रात से गले मिल रही

मैं स्याह रात वो चमकता चाॅंद था, मैं बुझी-बुझी वो दमक रहा
मेरा चांद मुझ संग ढल रहा बस इसलिए विहान मुझे खल रही

~सिद्धार्थ
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क्या देखते हो ...मैं तुम्हारे आने वाले कल का आईना हूँ 
जिस्म के रंगीन बाज़ार में वक्त की धूल चढ़ी दागीना हूँ । 
गुजरे कल के आंगन में रंग मेरा भी धानी था

~ सिद्धार्थ

चश्म ए नमनाक की ये तो बाजीगरी हैं
जब भी उनके दर से लौटे है आँसू गिरी है

ये दिल है मेरा … कि है आबला ए समन्दर
फूटे न बहे दर्द के मवाद से लबालब भरी है

जिस के देखे से ही सुलग जाती हूं मैं
जो छू ले तो लगे कोई दहका खड़ी है

जिस दिल के मशरिक़ में रहा वो खुदा बन के
उस दिल के मग़रिब में उसकी चप्पल पडी है

जीस्त भी क्या क्या सर्कस नहीं दिखती है पुर्दिल
चश्म जीने पे उसके तो जाॅं आफ़त में पड़ी है

~ सिद्धार्थ

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चाहने से भला चाॅंद कब जुड़े में सजता है

अबोध मन चाॅंद की परछाईं को भी अपना समझता है

~ सिद्धार्थ

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अच्छे भले थे हम तो, दिल को रोग लगा बैठे

बहुत कुछ देखने लायक थी इस दुनियां में 

जाने नज़र में वो ही क्यूॅं आ बैठे 

~ सिद्धार्थ

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बस तेरे दीदार को मैं महफ़िल तक चली आती हूॅं

वर्ना तो खुद से भी खींची खींची सी नजर आती हूॅं

~ सिद्धार्


अना तो उसी दिन तौल दिया था मैंने

जिस दिन दिल की बस्ती में वो आन बसा था 

~ सिद्धार्थ

***

तुम बेहतरीन ढूंढ़ते हो शायद ! जो मुझ में नहीं

पर कुछ तो सुना ही सकता हूॅं , सुनोगे क्या ... 

~ सिद्धार्थ

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हम तो घर में ही थे, मन जाने कहां गया

किसी ने आवाज़ दी होगी शायद, शायद वहां गया

~ सिद्धार्थ

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मुझे अब न दुआ लगेगी न दवा लगेगी

बदन को दर्द लगा है बदन को सर्द करेगी 

~ सिद्धार्थ

***

इश्क़ हैराँ है मेरा ये सोच कर ए जाने जाॅंना 

ख्वाहिशों की तितलियों में पड़ लगे

और किस क़दर मुनफ़रिद हम हो गए

ऊंघती पुलियों में जो मैंने ऑंजे सपन 

सच की धूप में प्राण वो मैले कैसे हो गए

~ सिद्धार्थ

मुनफ़रिद = एकाकी, अकेला

**"

रातों के दलदल में न जाने कब मेरे नींद धंस गए

हम जागते में भी तेरे ख़्वाबों के जंगल में फंसे गए


जाने किस किस से कब तलक झूठ बोलेंगे हम

होठों पे हॅंसी नयनों में मेरे क्यूॅं कर पानी बस गए


ये बात जड़ा अजीब है पर सच कहती हूं मैं

लगता है जैसे जिस्म में मेरे तेरे खुशबू बस गए

~ सिद्धार्थ

तुम से दूर जाना "जानाॅं" मेरे बस में नहीं

चश्म के दरिया को सूखाना धूप के ज्यूॅं बस में नहीं


जिस्म से गर लिपटे होते तो ! सच नोच फेकती तुम्हें

रूहों के रहवासी से मकां खाली करवाना मेरे बस में नहीं

~ सिद्धार्थ

***

उसकी तस्वीर के सारे रंग हाला हो गए

छलका न एक बूंद कहीं हम प्याला हो गए


अभी मैं भी हूॅं ,रात भी है अभी तक बाकी

होठों से लगाया गुलाबी प्लयाला उजाला हो गए 

~ सिद्धार्थ

***

जिस दवा के इस्म में हर्फ़-दर-हर्फ़ तेरा इस्म-ए-अज़ीम न आता था

मैंने वो दवा नजाकत से उठाई और खिड़की से बाहर फेंक दी

~ सिद्धार्थ

इस्म = नाम

***

हम भूल सकते थे तुम्हें 

शर्त बस इतनी थी

तुम दिल में नहीं दिमाग में होते 

तनहाई में साथ मेरे न हॅंसते न रोते ...

~ सिद्धार्थ

***

तुम बेशकीमती हो मेरी जाॅं

निकल आया करो मुंडेरों पर 

चिरागों का क्या है ? 

वो तो बुझ जाया करते हैं 

तेल के खत्म हो जाने पर

~ सिद्धार्थ

तुम्हें हर वक्त अपने यादों में

 इतराते देखना 

अच्छा नही...

तुम मानते हो न उसको ?

तो दुआ करो ... हक में मेरे 

मेरी याददाश्त, छोड़ जाय मुझको !

~सिद्धार्थ










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