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Showing posts from December, 2020

मीरा बाई

 नस नस में बिजुरिया थीरक गई रे  प्रेम इतना भरा मैं छलक गई रे चढ़ती नदीयां कभी बस में होती नहीं  जाग जाए प्रित तो कभी सोती नहीं सौ भंवर लांघ के मेरे पग चल पड़े भवें तन तन गई माथे पर बल पड़े घोर संकट में है आज मर्यादाएं  मेरे सर से चुनरिया सरक गई रे प्रेम इतना भड़ा मैं छलक गई रे नैन जुड़ते ही सिद्धांत टूटे मेरे  हो गई मान अभिमान झूठे मेरे लाओ मेरे लिए विष के प्याले भरो प्रेम अपराध है तो क्षमा ना करो छूट कर फिर करुंगी ये अपराध मैं  खुल गए मेरे हाॅंथ मेरी झिझक गई रे प्रेम में इतना भरा में छलक गई रे प्रेम की आग में जल गई मैं जहां,  रंग रंग के खिले बेल बूटे वहां तन पर मेरे अब उन नैनो की छाप है  कौन सोचे कि ये पुण्य है कि पाप है राह सच की दिखाओ किसी और को भटकना था मुझको भटक गई रे  प्रेम इतना भरा मैं छलक गई रे ये कहां धर्म ग्रंथों को एहसास है गहरी पाताल से हृदय की प्यास है ज्ञानियों में कहां ज्ञान ऐसा जगे पीर वही जाने तीर जिसको लगे डोल उठा जो थरथर जिया बाबरा कांच के जैसे मैं तो दरक गई रे प्रेम इतना भरा में छलक गई रे ~ मीरा बाई  🌺💞🌺

दिलबरी

 *** मैं देर तक रुकती  मगर अब देर हो गई ~ सिद्धार्थ *** हम न कहते थे दिलजले हो तुम आवारा नहीं तुम पे तुम ही तोहमत लगाओ ये हमें गवारा नहीं ~ सिद्धार्थ *** वक़्त लगता है मेरी जाॅं इस जहां से जाते जाते वक़्त होता तो तेरी पेशानी पे हम इक बोसा लुटाते जाते ~ सिद्धार्थ *†* सारे के सारे शब्द रीत गए मौसम जितने भी सुहाने थे, वो ... बीत गए  ~ सिद्धार्थ *** इस इश्क के हाथों हाय इक दिन हम मारे जाएंगे दिल के गांव में अपने हाय हम जिंदा दफ़नाए जाएंगे ~ सिद्धार्थ *** मेरा रंग नूर उतर रहा, मेरे बदन ए फलक पे शाम ढल रही  तू जरा और देर ठहर के देख, साॅंझ रात से गले मिल रही मैं स्याह रात वो चमकता चाॅंद था, मैं बुझी-बुझी वो दमक रहा मेरा चांद मुझ संग ढल रहा बस इसलिए विहान मुझे खल रही ~सिद्धार्थ *** क्या देखते हो ...मैं तुम्हारे आने वाले कल का आईना हूँ  जिस्म के रंगीन बाज़ार में वक्त की धूल चढ़ी दागीना हूँ ।  गुजरे कल के आंगन में रंग मेरा भी धानी था ~ सिद्धार्थ चश्म ए नमनाक की ये तो बाजीगरी हैं जब भी उनके दर से लौटे है आँसू गिरी है ये दिल है मेरा … कि है आबला ए समन्दर फूटे न बहे दर्द...

व्यंग्य : हरिशंकर परसाई

 वह जो दो आदमी है न : निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं। निंदा खून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है। निंदा से मांसपेशियाँ पुष्ट होती हैं। निंदा पायरिया का तो शर्तिया इलाज है। संतों को परनिंदा की मनाही होती है, इसलिए वे स्वनिंदा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं। ‘मौसम कौन कुटिल खल कामी’- यह संत की विनय और आत्मग्लानि नहीं है, टॉनिक है। संत बड़ा कांइयाँ होता है। हम समझते हैं, वह आत्मस्वीकृति कर रहा है, पर वास्तव में वह विटामिन और प्रोटीन खा रहा है। स्वास्थ्य विज्ञान की एक मूल स्थापना तो मैंने कर दी। अब डॉक्टरों का कुल इतना काम बचा कि वे शोध करें कि किस तरह की निंदा में कौन से और कितने विटामिन होते हैं, कितना प्रोटीन होता है। मेरा अंदाज है, स्त्री संबंधी निंदा में प्रोटीन बड़ी मात्रा में होता है और शराब संबंधी निंदा में विटामिन बहुत होते हैं। मेरे सामने जो स्वस्थ सज्जन बैठे थे, वे कह रहे थे - आपको मालूम है, वह आदमी शराब पीता है? मैंने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने फिर कहा - वह शराब पीता है। निंदा में अगर उत्साह न दिखाओ तो करने वालों को जूता-सा लगता है। वे तीन ब...