की कहु पहुना

की  कहू पहुना

की  कहू पहुना

अई बेर के कार्तिक में 

सब किछु बदैल गेलई अहुना 

रहई छी कहुना, जीबई छी कहुना

गेल छलखिन परदेश भईया 

पूसक मास में, कहले छलखिन 

रुपया भेजब कार्तिक मास में 


जाईत जाईत इहो कही के गेल छलखीन 

 "दीन दुनिया खराब छै से बहीना 

 रहीए नजर कईनका सम्भाईल के 

चिट्ठी पत्री भेजब हम पढ़ीहैं समभाईल के"


फागुन में चिठ्ठी एलई 

भुषना पईढ के बतैलकै  

" माय बाबू के परनाम करई छी

अंहा के प्यार हम लीखई छी

छोटकी बहीन के दुलार हम भेजई छी

माय - बाबू लेल नया नूआ - धोती हम पठायब 

छोटकी बहीन के सूगा बाला फ्राक आ टोपी पहीनायब 

जरी बाला चुनरी लाल चुड़ी कतैक दिन से अहां मगैछी 

से हो अई बेरा भेज देब अंहा नई अगुतायब

हम सब किछ जनई छी हे बहीना

की कहूं बहीना ...

 जोडई छी रुपया कहुना - कहुना

 

किछ रुपया जे भेजब समहाईर ओकरा रखिहैं 

दीवाली आ छईठ में नैका कपडा लत्ता पीन्ह के

 आंगन में सरसों तेल बाला ढीबरी जलबीहैं 

गमकौआ भात संगे

 नीमन तीमन तरकारी 

सब जने मील के भैर छांक खैहैं 

पांच गो रुपया दीहे छोटकी बहीन के

 मेला देखौला

 बानर बाला फूग्गा और 

लेमन चूस खाईला 

किछ रुपया जे बचतौउ बहीना

पंडिताइन के कर्जा  के भार तू ऊतारीहैं

लेने छलीअई जे आबे बेरा में

छाती में सूलगई अईछ

 बढैत सूद के जेना जेना सोचई छी 

की कहूं बहीना ... 

कहुना कहुना दिन हम कटैई छी

राईत हम गीनई छी

मालिक के गारी बात निस दिन सुनैई छी 

अच्छा ... रखैई छी आब 

भात चुलहा पे खदकैईया 

पडोसिन के छोटकी बेटी मुंह हमर तकैया"


की कहुं पहुना बीपत भेल कोना दुगुना 

चिठ्ठी एलैई ओकर अठबारे हम सुनलीअई 

सगरे कोरोना नामक डाकिन घुमैई छई

मुंह अ हाथ से देह में घुसैई छई 

घरे में रहु बाहर नै अहां नीकलु

सुनलीअई प्रधान सेहो कहई  छई  

आब बन्द छै काम, घर अपन कहां देखु 

भईया के मालिक से हो कहई छई

बीस दिनक पगाड से हो नई देलकई 

मुझउसा पगाड संग उम्मिदो रईख लेलकई

सुगनी के फोन से ई सब भईया बतैलकई

काम बिन, पगाड बिन 

 महीना  !भईया खेपलक केहुना  

जे आबे ला गाम कहलीअई

 हसलक यौ पहुना

कनी दिनक बात छै

 दील्ली छै गाम बडका

साग भाजी बेचब उठब हम तड़का 

संगे में रहत पड़ोस के एगो लडीका 

बिधना के खेल छै डरु नै अहां बहीना 

रुपया हम जोडब कहुना कहुना


रेलगाड़ी बंद छै डाको सब बंद छै 

चिंता अहां जुईन करब 

 कार्तिक मासक सुरुआते हम आयब 

जेना हम कहले छेलऊं ओहीना सब लायब 

सब चीजक साथ सनेसो हम लेने आयब 

कहुना कहूना पाई हम जोड़ईछी हे बहीना


इहे अठबाडे पहुना चिट्ठी एगो एलई 

भुषना के ज्वर छेलई ललमुनीया पढलकई

भईया के पड़ोसी जेकरा लीखलकई

"बड़ों को प्रणाम छोटों को आशीष

मंगला के पड़ोसी का मैं लड़का आशीष

रहा नहीं मंगला दुख रह गया बडका

कोरोना से जंग में हार गया आप का लड़का

जगह मिला न एक भी अस्पताल के खाट में

उखडती रही सांसें 

बुझता रहा जी का लै हाट में

रोग ऐसा था, कीसी ने हाथ लिया नही हाथ में

फूंक आया मैं अकेला ही

 मुनुसपेलटी वाले के साथ में

अबके गांव से कोई आए पता मेरा बतलाना

कुछ सामान पड़ा है उसका

 जीसको है भीजवाना

कुछ टूटे सपनों की छोटी सी गट्ठड पडी है

 उसको ,किसी अपने को ही भेज मंगवाना 

अंत में बस इतना ही है बतलाना

गरीबों को पड़ता है

 ऐसे ही सड़कों पे ही मर खप जाना"


की कहु पहुना हमर सभहक सपना

आईग भेलई जीयक जेल में

 तेल भेलई राईत दिनक लोड यै पहुना

 भेटईया नई ऑंईख लेल कोनो एगो ढकना

रहई छी कहुना, जीबई छी कहुना


की कहूं पहुना सोचईछी अहूना

करती करेज काठ अंगुठा नैई लगौती

चुईन के सीयार संसद में नै लौईती

कि फेर कोई मंगला के 

कोनो बहीन नई गवईती

~ सिद्धार्थ


***

मीता हमरो मन छल, रउआ संग मिलतऊँ एक बार 

कररितऊँ संगे बईठ के गाम घरक दुख अ सुखक बात !

...सिद्धार्थ 



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