आईना को उल्ट-पलट के देख
आईना को उल्ट-पलट के देख
आईना को उल्ट-पलट के देख लो
चाहे जितनी भी बार
सच के दामन से लिपटने के लिए
आँख मिलाना ही पड़ेगा हर एक बार।
बंद आँखों से सच कभी दीखता नहीं
ये वो सय है जो बाज़ार में कभी बिकता नहीं,
ज्युँ गांधारी को आँख होते हुए भी
अपने सूत का व्यभिचार दीखता नहीं
आँख पे गर पट्टी बंधी हो
हो कपास की, या हो भक्ति भाव की
सच को देखने के लिए
आँख मिलाना ही पड़ता है हर एक बार।
साहिबे मुल्क खड़े हैं,
लोक तंत्र के बाजार में
एक हांथ में थामे भक्ति कि पट्टी
दूजे में अक्ल का ताला थाम के
लोकतंत्र कि खैरियत से इन्हें कहां दरकार
ये वो सरकार जो देशभक्ति कि पीठ पर है सबार
बंदेमातरम जिसके हाथों का अनोखा है हथियार
देखिये तो ये हमारे कैसे खेबन हार हैं
अपने लिए ही जिनके मुख में जय जय कार है
अब हमारे लब पे भी
बस इंकलाबी यलगार है...
इंकलाबी यलगार है
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⇝सिद्धार्थ ⇜
.2.
हाँ हम ‘अर्बन नक्सल’ हैं

देश बेच कर जो खाते हैं,
खाते जो कभी नहीं अघाते हैंदेश प्रेम की बातें मन में भूले से भी कभी नही लाते हैं
देशभक्ति को जुमला बस बनाते है
वो पूँजीवाद के पैरोकार हैं…हाँ
आजकल हमारी वही सरकार है.
हम मेहनत कश लोग
मेहनत की रोटी ही खाते हैं

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