आईना को उल्ट-पलट के देख


आईना को उल्ट-पलट के देख 




आईना को उल्ट-पलट के देख लो 

चाहे जितनी भी बार  

सच के दामन से लिपटने के लिए 

आँख मिलाना ही पड़ेगा हर एक बार।

 बंद आँखों से सच कभी दीखता नहीं 

ये वो सय है जो बाज़ार में कभी बिकता नहीं,

ज्युँ गांधारी को आँख होते हुए भी

अपने सूत का व्यभिचार दीखता नहीं 

आँख पे गर पट्टी बंधी हो

हो  कपास की, या हो भक्ति भाव की  

सच को देखने के लिए 

आँख मिलाना ही पड़ता है हर एक बार। 

साहिबे मुल्क खड़े हैं, 

लोक तंत्र के बाजार में 

एक हांथ में थामे भक्ति कि पट्टी 

दूजे में अक्ल का ताला थाम के 

लोकतंत्र कि खैरियत से इन्हें कहां दरकार 

ये वो सरकार जो देशभक्ति कि पीठ पर है सबार 

बंदेमातरम जिसके हाथों का अनोखा है हथियार 

देखिये तो ये हमारे कैसे खेबन हार हैं

अपने लिए ही जिनके मुख में जय जय कार है 

अब हमारे लब पे भी

बस इंकलाबी यलगार है... 

इंकलाबी यलगार है

***

⇝सिद्धार्थ ⇜

.2.

हाँ हम ‘अर्बन नक्सल’ हैं


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देश बेच कर जो खाते हैं,

खाते जो कभी नहीं अघाते हैं
देश प्रेम की बातें मन में भूले से भी कभी नही लाते हैं
देशभक्ति को जुमला बस बनाते है
वो पूँजीवाद के पैरोकार हैं…हाँ
आजकल हमारी वही सरकार है.
हम मेहनत कश लोग 

मेहनत की रोटी ही खाते हैं

मेहनत से घर-बार चलाते हैं
कुछ खाते और जरा सा बचाते हैं
बस हर लम्हा देश की ख़ातिर,
देश में ही आवाज़ अपनी उठाते हैं
सत्ता के कानों तक चीखें अपनी पहुंचाते हैं.
जो हम से हमारे ही हाथों से,
अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से

हमारे ही लाशें हमसे उठबाने को अकुलाते हैं
और जोर-जोर से बंदेमातरम गाते हैं
और देश भक्ति पे बढ़-चढ़
के नारे भी वही लगाते है
ये जनता बिरोधी सरकार है,
जो अपने लालच से लाचार है
हमारी हक कि बातों से
उसे न कोई भी दरकार है.
हाँ हम ‘अर्बन नक्सल’ हैं,
पर देश पे ही प्यार लुटाते हैं

सीमा पे अपने अपनों को हमीं तो गवाते हैं
देश बेच जो खाते हैं,
खाकर बड़ा इतराते हैं
मेरी नजरों में देशद्रोही वही कहाते हैं.
हम तो बस देश प्रेम को दिल में ही बसाते हैं

बस उनके जैसे जिव्हा पे नहीं फिराते हैं,
हम मन ही मन में गाते हैं
माँ है ये मेरी,
माँ से प्रेम चिल्ला-चिल्ला के नहीं जताते हैं !

फिर भी अर्बन नक्सल कहलाते हैं

⇝सिद्धार्थ ⇜

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