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Showing posts from April, 2021

मैं " सिद्धार्थ" बुद्ध नहीं इंसान होना चाहती हूॅं

 मैं " सिद्धार्थ" बुद्ध नहीं इंसान होना चाहती हूॅं मेरे नाम में बुद्घ निहित है " सिद्धार्थ" पर मैं बुद्ध नहीं, बुद्ध होना भी चाहूं तो... हो  नहीं  सकती,  क्यूं कि...मैं स्त्री हुॅं,  स्त्री जिस के लिए खींचे गए है अनदेखे लक्ष्मण रेखा,  जिस में जन्म से बोया गया है  यशोधरा और सीता के "जी" को कहां संभव है किसी स्त्री का बुद्ध हो पाना  अंधेरे का हाथ पकड़,  गेरुआ धारण कर पाना और निकल जाना  स्त्य के उजाले की तलाश में और पलट कर भी न देखना  गृहस्थी के आकाश को मैं बुद्ध तो नहीं,  मैं पुरुष तो नहीं, मैं स्त्री हूॅं कहां संभव है मुझ स्त्री के लिए जो धारण तो करती है नाम  बुद्ध के कई नामों में से एक नाम "सिद्धार्थ" को  सत्य ढूंढती फिरुं बुद्ध होने के तलाश में  जंगलों में बिना किसी अवकाश के मन में लिए सत्य के विश्वास को मेरे ही सत्य को कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा मेरे ही सत्य से मेरे स्त्रीत्व का गला घोट दिया जाएगा मुझे बुद्ध तो नहीं! पर  कुलटा, चरित्रहीना साबित कर दिया जायेगा बुद्ध होने के लिए,  उस से पहले इंसान होन...

मुझे याद है

 मुझे याद है  मैंने कहा था सांप!  उसने सुना था आप मैंने फिर कहा! इन्हें नाप उसने कहा! अरे ना हाथ जोड़कर करो जाप मैंने झल्लाकर फिर कहा  ये हैं श्राप उसने फिर कहा अरे नहीं अरे ये तो हैं हमारे बाप  मैंने कहा देखो तो चहुंओर   अविश्वास की हवा चली  भूख की है आग लगी  रोजगार की खेत जली  उसने कहा देखो तो   धर्म की कैसी जोत जली  देशभक्ति की शीतल बयार चली    तभी! 6 वर्ष की बेटी ने  धोती खींचते हुए उन्हें ये कही  'बाबा क्यूं फिर 4 दिन से   अपने घर के चूल्हे पे   नहीं कोई पतीली चढ़ी  अंदर चल कर देखो तो  मां धरन से क्यूं झूल रही  नाक का लैंग पायल - बिछिया  सब बिस्तर पर क्यों छोड़ चली' मुझे याद है मैंने कहा था संसद से उठती हवा हमें  मानसिक दासता के सडन की ओर ले चली ~ सिद्धार्थ  2;  हे ईश्वर मैंने देखा  लोगों की तनी हुई थी भौंएं सना हुआ था हाॅंथ खून से बिखरी हुई थी लाशें चारों तरफ  लाशों के पेट फाडे गए थे  तलाशी ली गई थी कुछ मुट्ठी चावलों की  जो...