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Showing posts from May, 2019

बढ़ो कि माँ ने तुम्हें बुलाया है !

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⇹बढ़ो कि माँ ने तुम्हें बुलाया है ⇹ माँ पे गिद्धों का पड़ आया साया है  चोरों ने माँ को बहुत ही रुलाया है,  कुछ खुद खाया,  कुछ अज़ीज़ों को भी खिलाया है,  कुछ चोरों को देश से बाहर भी भगाया है,  मिल कर माँ को दुखिया बनाया है,  बांट-बांट कर खुद को बनिया बनाया है. अब माँ रोती है चीत्कार करे,  अपने सूत से कैसे प्रतिकार करे,  हम ने जिसे जननी माना था,  जिस के लिए,सपूतों ने,  बढ़-चढ़ कर अपना जान गवाया था.   अब चोरों ने बेचारी उसे बनाया  है,  नोच -चोथ कर मैली कलुषित बनाया है. कहीं मान का हरण किया, तो  कहीं तेज़ाब से नहलाया है,  अंग-अंग को बाज़ार तक लाया है. अब तुम पे भार सब हो आया है  बढ़ो कि माँ ने तुम्हें बुलाया है  अपने हिस्से का मान तुम से अब मंगवाया है।  ⇝सिद्धार्थ⇜

आईना को उल्ट-पलट के देख

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आईना को उल्ट-पलट के देख  आईना को उल्ट-पलट के देख लो  चाहे जितनी भी बार   सच के दामन से लिपटने के लिए  आँख मिलाना ही पड़ेगा हर एक बार।   बंद आँखों से सच कभी दीखता नहीं  ये वो सय है जो बाज़ार में कभी बिकता नहीं, ज्युँ गांधारी को  आँख होते हुए भी अपने सूत का व्यभिचार  दीखता नहीं  आँख पे गर पट्टी बंधी हो हो   कपास की, या हो भक्ति भाव की   सच को देखने के लिए  आँख मिलाना ही पड़ता है हर एक बार।  साहिबे मुल्क खड़े हैं,  लोक तंत्र के बाजार में  एक हांथ में  थामे भक्ति कि पट्टी  दूजे में अक्ल का ताला थाम के  लोकतंत्र कि खैरियत से इन्हें कहां दरकार  ये वो सरकार जो देशभक्ति कि पीठ पर है सबार  बंदेमातरम जिसके हाथों का अनोखा है हथियार  देखिये तो ये हमारे कैसे खेबन हार हैं अपने लिए ही जिनके मुख में जय जय कार है  अब हमारे लब पे भी बस  इंकलाबी यलगार है...  इंकलाबी यलगार है *** ⇝सिद्धार्थ ⇜ .2. हाँ हम ‘अर्बन न...

Shiddharth: बेशक थोड़ी मजबूर हूँ, पर हाँ मैं भी एक मजदूर हूँ ।

Shiddharth: बेशक थोड़ी मजबूर हूँ, पर हाँ मैं भी एक मजदूर हूँ । : .1. सौ में नब्बे आदमी हर दौर में मजदूर है  सौ में नब्बे आदमी हर दौर में मजदूर है बांकी जो भी बचे वो सेठ हैं, जो मगरुर हैं। क...

बेशक थोड़ी मजबूर हूँ, पर हाँ मैं भी एक मजदूर हूँ ।

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.1. सौ में नब्बे आदमी हर दौर में मजदूर है  सौ में नब्बे आदमी इस दौर में मजबूर हैं जो मजदूर है बांकी जो भी बचे वो सेठ हैं, जो बड़े मगरुर हैं। कोई हसुआ-हथौड़ा लिए मेहनत की राह पे चल रहा कोई फाईलों के बीच दुविधाओं के जाल में निस दिन पल रहा। किसी का बचपन फ़ुटपाथ के गोद में मचल रहा कूड़े-कचरे के ढेर में कहीं जिंदगी की ताप से कोई जल रहा। किसी की जबानी भट्टियों की आग में मोम सा गल रहा बुढ़ापा किसी का खेतों की मेड़ पर ही शाम सा ढल रहा। कोई सबनमी होठों के झनकार से पेट की आग मसल रहा कोई सरकारी दफ्तरों में सुबह से लेकर शाम तक बिकल रहा हर तरफ मजदूर दिवस के नाम पे नारों का बस शोर है  मजदूरों के हक़ की बात तो बस साहेब के जुमलों में ही उछल रहा। लोकतंत्र में, जन गण मन- 'अधिनायक' के ठोकरों में पल रहा अधिनायकों को हर हाल में वो खल रहा जो उबल रहा सोचिए सौ में नब्बे आदमी जब मजदूर और मजबूर हो एक साथ हुंकार उठे तो कैसे सिंहासन हिल न उठे जो अभी मगरुर है ~ सिद्धार्थ शब्दों की बेनी, कलम की धार पे ये जो मैं चल रही हूँ बेशक थोड़ी मजबूर हूँ, पर हाँ मैं भी एक मजदूर हूँ । *** ...सिद्धार्थ ... ...