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सुगंधा की बकरी

सुगंधा कुछ बडबडाते हुए तेज - तेज कदमों से आंगन पार कर रही थी। उसके एक हाथ में छोटी सी बाल्टी दूसरे में बांस की छोटी सी टोकनी जिसमें रात की बची बासी रोटी और आटे का चोकर था। तभी दरवाजे से अंदर आते नीलेश ने पूछा "बूढ़ा तो गई ही हो अम्मा दिमाग भी खराब हो गया है क्या? यह ... काम करते करते तुमको बड़बडाराने की आदत कहां से पड़ गई ?" सुंगनधा को ऐसे जान पड़ा मानो किसी ने नंगी बिजली की तार से उसे छू दिया हो। उसने झल्लाहट और चिढ़ में अपनी चाल और वाणी दोनों को गति देते हुए कहा "हां तुम लोग सहर जाकर दू चार किताब पढ़ कर ज्यादा होशियार हो गए हो न ... हम क्या जाने होशियारी हम तो गवई गवार लोग तुम लोग ही सब समझते हो जाओ इहां से नहीं तो झगड़ा हो जाएगा .... नीलेश जो उसके पीछे पीछे चल रहा था आज पूरा का पूरा ठिठोली के मूड में था। गांव के सभी छोटे बड़े उसे पसंद करते थे, सुगंधा कुछ ज्यादा ही। निलेश जब भी शहर से गांव आता वह सर्वप्रथम सुगंधा से मिलने जाता ... सुगंधा के हाथों नाश्ता पानी करने के बाद ही वो अपने आंगन जाता और वहां लोगों से मिलता था। इस बार भी उसने ऐसा ही किया लेकिन आते ही देखा सुनंदा...